सेब के भार से झुका पेड़

सेब के पेड़ों से भरा बहुत बड़ा सा बगीचा। प्रत्येक पेड़ के तने से फल लटक कर नीचे की तरफ झुका हुआ था।

बालमन हृदय सोचने को विवश की ये नीचे क्या कुछ लेने अथवा क्या करने झुका है ? ये लेगा क्या ? इसके पास तो स्वयं बहुत सारे फल हैं ? इसकी प्रवृति तो देने की है ना की लेने की .. या फिर मुझे बच्चा समझ नीचे आ गया जिससे मैं तोड़ कर खा सकूं... हां शायद यही बात होगी ?

पेड़ की तरफ जैसे ही बढ़ा की मां आ गई और मुझे लेकर जाने लगी ।

मैं पेड़ को वाय दोस्त बोलकर देखता मुस्कुराता मां के साथ आगे की ओर बढ़ रहा था तो...

मां ने इधर उधर देखा फिर पूछा यहां तो कोई नहीं है , फिर तुम्हारा दोस्त कौन है ?

ये सारे पेड़ मेरे दोस्त हैं । देखो मैं छोटा हूं न इसलिए ये नीचे झुक गए है जिससे मुझे फल लेने में सुविधा हो।

नहीं बेटे !फल बहुत ज्यादा लगे हैं टहनियों में...तो उसके

भार से झुक गए हैं। फल से भरा हर पेड़ झुक ही जाता है।

बालमन में प्रश्न पर प्रश्न उत्पन्न हो रहा था।

मतलब मां !जो ज्ञानवान व्यक्ति हैं वो भी अपनी प्रतिभा तीव्र बुद्धि अलौकिक शक्ति और ज्ञान के भार से झुक जाते हैं जैसे देवेश काका झुके हुए हैं ?

मां रुक गई और मुझे निहारने लगी । मुझे कुछ समझ नहीं आया ।अच्छा मां ! ये बगीचा तो हमारा है न ?

हां बेटे और एक पेड़ के नीचे बैठी और मुझे भी पास में बिठा लिया ।

मां ! बाबा तो बीमार हैं? फिर इतना बड़ा बगीचा क्यूं और कब लिया ? क्या बाबा को सेव बहुत पसंद है ?

बेटे ! हर प्रतिभावान , बुद्धिमान व्यक्ती में नम्रता होती है वो शांत चित्त स्वभाव वाले होते हैं जैसे हमारे गुरुजी समझ गए।

दूसरी बात काका बीमारी की वजह से झुके हैं।

तीसरी बात बाबा ने गुरुजी से ज्ञान प्राप्ति के बाद ही ये बगीचा इसलिए खरीदे जिससे अमीर गरीब  बीमार भूखा व्यक्ति यहां तक कि पशु पक्षी कीट सबको प्राप्त हो।

ओ अच्छा ! गुरुजी बाबा को क्या ज्ञान दिए थे?

कुछ देर चुप रहने के बाद बोली...

तुम्हारे बाबा पहले अच्छे आदमी नहीं थे , गलत काम करते हुए उनका मन एक दिन बहुत बेचैन हो गया । वो निर्जीव सा पड़े रहते थे, एक ही रट्ट लगाए मैने बहुत गलत काम किए हैं । नरक की दुर्गति नहीं सह सकूंगा पश्चाताप का कोई तो उपाय होगा।

किसी के कहने पर हम गुरुजी के पास गए। पर कुछ कह नहीं सके । अब बाबा रोज रोज जाते हुए एक दिन गुरुजी ने कहा क्या तकलीफ है बताओ ।

तुम्हारे बाबा ने उन्हें सारी बातें बताई और मेरे पाप कम हो जाय इसके लिए मैं कुछ भी करूंगा।

गुरुजी ने कहा परोपकारी कर सकोगे तो करो ।

परोपकारी क्या और कैसे करना है मैं नहीं जानता।

जितना पाप किए हो उतने ही लोगों का उपकार करो।

कैसे करूंगा मैं पापी अधर्मी अज्ञानी हूं उपकार करना नहीं जानता।

गुरुजी एक प्रश्न पूछे की सेब देखे और खाए हो?

जी गुरुजी ।

सेब में कितने बीज होते हैं ?

जी तीन या चार।

एक में तीन तो दो सेब में कितना हुआ ? सेब खाते हो..बीज का क्या करते हो?

जी छः सात। बीज फेक देता हूं। आप क्या कह रहे हैं ,

मैं समझा नहीं गुरुजी... सही दिशा और ज्ञान दीजिए।

गुरुजी मुस्कुराते हुए कहे वही समझा रहा हूं वत्स...

दो सेब से छः सात बीज हुए। उन बीजों को फेंकने के बजाय जमीन में गाड़ दिया जाए तो सात पेड़ होंगे उनसे बहुत सारे फल प्रत्येक जीव को प्राप्त होगें।

जी गुरुदेव मैं समझ गया। और प्रणाम कर आ गए।

गुरुजी के कहेनुसार बाबा ने वो सब किया फिर धीरे धीरे पैसा कमाये तो जमीन खरीदकर पूरे जमीन में सेब का पेड़ लगा दिए और बहुत ही कम मूल्य में बेचते और गरीब , बीमार भूखे को मुफ्त में देते ।

थोड़ा बहुत तो कर्म की सजा भुगतनी पड़ती है तो बाबा बीमार हैं। मनुष्य को सुशील ईमानदार और नम्र होना चाहिए।


मौलिक स्वरचित ✍️

रीता मिश्रा तिवारी