प्रेमपथ

प्रेम पथ पर जो मिला

ये भी सुखद वो भी सुखद 

प्रेम पथ कंटक शूल है

प्रेम है नंगें पांव 

प्रेम रक्त की धार सखी री

प्रेम है हरसिंगार

प्रेम है मेरा गुलमोहर सा

रक्तवर्णी लाल सा खिल गया 

और बिछ गया प्रेम ही की राह में

प्रेम गुलमोहर और खेजड़ी, 

कीकर भी राह बिछे और 

राह बने भी ये रहे साथ

जो खानाबदोश सा मुसाफ़िर

धोरों में भटके कभी

मुसाफ़िर है,कहाँ रुकना

वो आगे बढ़ ही जाना है

घने हो गुलमोहर, कीकर

या चाहें खेजड़ी लेकिन

घने धोरे में कब तक

आस छाँवों की

धोरों पे छांव की नहीं

धनक की आस करते हैं

आ प्रेम में साथ चलते हैं।


डिम्पल राकेश तिवारी

अयोध्या-उत्तर प्रदेश