अपनी-अपनी परिधि में भी...

नहीं समेट सकते हम

सारा का सारा आकाश

अपनी बाहों में ,

और न ही 

वो दूर तक फैला चमकीला प्रकाश 

नहीं न !!


एक वृताकार जैसे घेराव पर

हम-तुम

दो विपरीत ध्रुवों की तरह

परस्पर आकर्षित ,

मानों चढ़ने लगते हैं

ऊंचाईयों की सभी सीढ़ीयां एक साथ

जब कभी

अदलते-बदलते मौसमों की तरह

लौट आते हैं बार-बार

फूल बनकर..

धूप बनकर..

बादल.. बारिश..हवा बनकर..

एक साथ !!


..और इस तरह हम "जी" लेते हैं

हमारा "एक साथ होना"

अपनी-अपनी परिधि में भी !!     


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ