पति की मां

अभी - अभी तो वह मायके से लौटी थी। एक पैकेट मिठाई थोड़े से शक्कर पारे और कुछ गुझिया हां साथ में एक साड़ी भी थी।बहुत खुश नजर आ रही थी।आते से ही सास के पांव पड़े कपड़े बदल रसोई घर में घुस गई।शाम की चाय का समय था और सफर के कारण थकी हुई भी थी तो जल्दी से चाय बना कर ले आई सास और पति को चाय देने के बाद खुद भी चाय का प्याला हाथ में ले अपने कमरे में चली गई। सोचा आराम से पलंग के सिरहाने तकिये से टिक कर पांव फैला कर बैठ कर शांति से चाय पीकर सफर की थकान उतारेगी। अभी सिरहाने तकिया टिका कर बैठी ही थी कि पति देव नें आवाज लगाई यहीं आजाओ मेरे और मम्मी के पास। अकेले चाय मत पिओ साथ में पियेंगे। वह सोचने लगी साथ में रहो तो मां- बेटे एक हो जाते हैं अक्सर बस मेरी बात ही काटना होती है। हमेशा इन दोनों को।मां बेटे हमेशा एक दूसरे का साथ देते हैं कभी भी एक दूसरे की बात काटते नहीं हैं। खैर छोड़ो बुला रहे हें तो जाना तो पड़ेगा। बस यही जानना चाह रहे होंगे कि राखी पर मायके से क्या-क्या मिला।उसने अपना चाय का प्याला उठाया और बाहर सास के पास आकर बैठ गई। सास नें पूछा बहु मायके में सब ठीक है तुम्हारे पिताजी की तबीयत कैसी है। रक्षा बंधन का त्यौहार कैसा रहा कौन-कौन था घर में। बहु समझ गई पिताजी की बिमारी तो एक बहाना है ।इन्हें तो यह जानना है कि तुम्हारी भाभी भी रक्षा बंधन के दिन घर पर ही थी या वो भी अपने मायके गई थी। सास झगड़े के लिए मटेरियल इकट्ठा कर रहीं हैं।यह वह बहुत अच्छी तरह से जानती थी। सच बोले तो मुश्किल है झूठ बोलो तो मुश्किल। बड़ी उलझने हैं जिन्दगी में।बहु समझदार थी उसने बड़ी ही खुबसूरती से बात को टालनें के लिए बोल दिया मम्मी जी चाय ठंडी हो जायेगी पहले चाय पी लेते हैं फिर रात का खाना भी तो बनाना है । बच्चे खेलकर आयें उसके पहले खाने की तैयारी हो जाये तो ठीक रहेगा। मम्मी जी साल भर बाद मायके गई थी खूब सारी बातें हैं आराम से बतियाऐंगे। और उसने जल्दी -जल्दी चाय खत्म करी और चाय के प्याले समेट रसोईघर में चली आई। चाय के झूठे प्याले सिंक में रख वहीं दिवार के सहारे खडे हो कर लम्बी सांस ली चलो आज तो बच गये। कल की कल देखेंगे।उसे लग रहा था ये सास पीछा छोड़ने वाली नहीं है। यदि इन्हें सच - सच बता दूं कि भाभी मायके नहीं गईं तो पूरा दोष मेरे माता-पिता के सिर मढ़ देंगी। और इनको बोलेगी कि देखो इसकी भाभी भी तो मायके नहीं जाती है कितनी चिन्ता करती है अपने ससुराल की अगले साल रक्षा बंधन पर यह मायके जाकर क्या करेगी? यहां भी तो इसकी जरूरत है इस घर का काम कौन करेगा या ऐसा बोलेंगी कि एक हम हैं बड़े दिल वाले बहू को मायके भेजने में तनिक संकोच नहीं करते हैं। इसकी मां से बोलो तनिक हमसे भी कछु सीखले । सास सुनाएंगी तो जली- कटी सुनना पड़ेगा जवाब दो तो घर का माहौल खराब महीनों अपना दिमाग खराब और पति का भी दिमाग खराब। इनका क्या है, हमारा दिमाग खराब करने के बाद अपनी बेटी को नमक मिर्च लगा कर सुनाएगी क्यों कि इस बार रक्षा बंधन पर ट्रेने ही कैंसिल हो गई। वो तो मेरा भाई कार लेकर आया तो मैं चली गई।अब ये खुन्नस भी मुझसे ही तो निकालेंगी।सफर की थकान के बावजूद भी उसे देर रात तक नींद नहीं आई। करवटें बदलते- बदलते कब नींद लग गई और सुबह हो गई पता ही नहीं चला।जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं सुबह उठने के बाद वह भूल गई।लेकिन जैसे ही चाय लेकर सास के कमरे में गई तुरंत सारी बातें याद आ गई।उसे लगा गलती हुई चाय इनके हाथ से भेज देती तो अच्छा रहता। जैसे ही सास नें मुंह खोला और कहा बहू सुनों उसनें तुरंत कहा मम्मी जी अभी आयी और वहां से तुरंत खिसक ली सीधे अपने कमरे में आयी और जो साड़ी रक्षा बंधन पर भाई नें उसे दी थी वह निकाली और सोचा ये साड़ी सास को दे देती हूं।खुश हो जायेंगी तों झगडे - झंझट से भी मुक्ति मिल जायेगी। ऐसा सोचकर जैसे ही वह पिछे मुड़ी देखा तो सासु मां हाथ में वही साड़ी लेकर खड़ी हुई हैं जो उन्होंने रक्षा बंधन पर अपनी बेटी को देने के लिए बड़े शोक से खरीदी थी।उसने कहा मम्मी जी ,और अभी उसकी बात शुरू भी नहीं हुई थी कि सास नें बीच में ही टोक दिया बहु तुम्हारे भाई नें बहुत अच्छी साड़ी तुम्हें दी है यह तुम पर बहुत अच्छी लगेगी। और यह साड़ी भी तुम रख लो ।तुम पर यह भी बहुत अच्छी लगेगी।इस बार तुम्हारी ननद मायके नहीं आ पाई ।अब साल भर सम्हाल कर अलमारी में रखने से क्या फायदा अगले रक्षा बंधन पर उसे  दूसरी साड़ी दिला देंगे। वह खुश होकर सास से बोली मम्मी जी अगले रक्षा बंधन पर दीदी को एक नहीं हम दो साड़ी देंगे। आज उसकी आंखों पर  पड़ा पर्दा हट गया था। कोई व्यक्ति हमेशा ही खराब नहीं होता है। हम कई बार गलत सोच लेते हैं और उसके अनुरूप ही आचरण करने लगते हैं।तब विपरित परिस्थितियों का निर्माण होता है। हर औरत में मां का दिल होता है। बेशक वह पति की मां ही क्यों ना हो। मां तो मां ही होती है। अब उसे अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि नज़रें बदलो नज़ारे अपने आप बदल जायेंगे।और अब नज़ारे बदलना शुरू हो गये थे और ये नज़ारे बहुत अच्छे थे। तथास्तु।


श्रीमती रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार

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