अंधविश्वास

विज्ञान के इस युग में भी छाया कैसा अंधविश्वास का तम,

पहुँच गये अंतरिक्ष पर धरा पे पिछड़े रह गये हम।


कहीं बलि चढ़ जाते हैं बच्चे, कहीं नारी का शोषण,

अभिलिप्सा बन गया मानव जीवन का अवलंबन।


जादू टोना के मायाजाल में फँसकर कितना अनर्थ हो जाता है,

बाबाओं के चक्कर में पड़कर आँखों पर पट्टी बँध जाता है।


विद्यार्थी सोचते बिन मेहतन के अच्छे नम्बर लायें,

प्रशाद चढ़ा कर ईश्वर को बिन पढ़े ही पास हो जायें।


क्यों भूल रहे सब गीता के उपदेश को,

कर्म ही पूजा है श्री कृष्ण के संदेश को।


उलझ गया है मनुज मृगतृष्णा की दौड़ में,

जादू टोने ,अंधविश्वास से इच्छा पूरी करने की होड़ में।


बचपन से ही बो दी जाती है बीज अंधविश्वास की,

बिल्ली रास्ता काटे तो रुक जाओ,कई ऐसे अविश्वास की।


बहुत आगे आ गये हैं हम,और आगे है हमें जाना,

छोड़ो अंधविश्वास का दामन,ग़र चाहो क्षितिज को पाना।


                           रीमा सिन्हा (लखनऊ)