नारी

ईश्वर ने अनुपम रचना कर,

सृष्टि का संचार किया,

धरती पर आकर नारी ने,

सृजित नया संसार किया।

बनके किरण भानु की चंचल,

जगत प्रकाशित करती है,

ताप से तापित होते जग को,

चांदनी बनके हरती है।

सूखी धरा को वर्षा जल से,

उर्वर भूमि बनाती है,

पत्र - पत्र में स्पंदित हो,

सांसों में बस जाती है।

नयनों की निर्मल ज्योति बन,

मन की ज्योति जलाती है,

चेतन का प्रवाह बनकर जो,

जग चैतन्य बनाती है।

सागर की उत्तुंग तरंगे,

साहस की परिभाषा है,

कूप के शीतल जल के जैसी,

मन की मीठी भाषा है।

पुष्पों की कोमलता जिसमे

मधु का अनंत भंडार है,

दसो दिशाओं की खुशुबू में,

बसा हुआ आगार है।

कण कण में जो बसी हुई,

मातृभूमि वो प्यारी है,

सृष्टि के इस पावन मन्दिर की,

पूज्य मूर्ति ही नारी है।।


सीमा मिश्रा,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री व 

शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार,

बिन्दकी-फतेहपुर,उ0प्र0