पहेली

यह पहेली है 

अलबेली-अटपटी सी,

जाने कहां -कहां से आ 

टपकी हमजोली सी।

फूल कि खुशबू 

बहुत निराली सी,

जाने किन-किनको अपने 

प्रियतम कि याद यह दिलाती,

हवा यह कैसी चली सी,

नाचे मोर सावन में सतरंगी सी।

आसमानो से यह बूंदे कैसी,

कोई सुख-दुख ही बोली 

बोल रही हो जैसी,

यह काला बादल कैसी,

कोई हमारे दर्द को 

ढकने को हो ऐसी।

निर्मल पानी कि 

आवाज मधुर सी,

कोई बैठ कर सुने 

इनकी धुन सुरीली,

प्यास बुझाती शुद्ध प्यारी सी,

कुछ तो खास है हमारे 

मन कि पहेली सी।


ईशानी मुखर्जी

रायपुर-छत्तीसगढ़