क्या यही गुनाह मेरा.....?

जब तू छोड़ चली

आँगन अपना अधूरा

वो रोते बिलखते बच्चें

सूना सा घर तेरा

तेरे उजड़े घर को

मैं सवांरने आई

क्या यही गुनाह मेरा

दूसरी पत्नी बन आई।

नाम स्वयं का होते भी

तेरे नाम से पहचान बनाई

क्या यही.....…?


दिल मेरा भी दुखा होगा

जब छिन गई मुझसे

मेरी पहचान सारी।

वो सब भी मैंने सह लिया

तेरे बच्चों को गोद लिया

छोड़ नई दुल्हन का वेश

माँ का रुप धर लिया

एक पल में ही मैं

पत्नी से माँ बन आई।

क्या यही........?


पति का पूर्ण समर्पण

पा न सकी बहना

तेरी यादों के झरनों में

उनका गिरते रहना

वर्षो की तपस्या के बाद

उनके दिल में जगह बनाई।

क्या यही...........?


ना नई दुल्हन सा लाड़ हुआ

ना पति का पहला प्यार मिला

तुम गई इसलिए'मैं'आई

ताना यही हर बार मिला।

क्या यही..........?


मेरे भी अरमान थे बहना

नई दुल्हन से चांव थे

सजना -संवरना घूमना - फिरना

मेरे भी ख्वाब थे।

तेरी अधूरी रही जिम्मेदारियों में

अपनी चाहते दबा गई।

क्या यही............?


कवयित्री:-गरिमा राकेश गौतम

पता:-कोटा राजस्थान