हादसे का सफर

उनके साथ हादसे कुछ इस कदर होते चले गये।

वह और अधिक समुद्र से गहरे,नमक से नमकीन

होते चले गये। रिश्ता कुछ बन ना सका उस 

दरमियाँ। हादसे कुछ इस कदर होते चले गये।

लिबास पर लिबास बदलते रहे और आदतें बदल

ना साके वो। मजबूर वक्त और मजबूर होता चला

गया।फिर खुद के साथ चल ना सके। और खुद से

ही दूर होते गये वो।

उनके साथ हादसे कुछ इस कदर होते चले गये।

हम उनसे जुड़ने लगे वह कहीं और जुड़ते चले

गये। अब किसको क्या मिला यह तो मुकद्दर

की बात है।

वे बे-मुरव्वत और हम बे-ख्याल होते चले गये। 

जिक्र उनका हो तो अब हम बात बदल देते हैं।

और गलती से वह ख्यालों में आ जायें तो हम

ख्याल बदल देते हैं।

उनके साथ हादसे कुछ इस कदर होते चले गये।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com