देश ऋणी है

बेटियों के साथ साथ

देश  ऋणी है उन माताओं का भी,

जिसने बेटियों के बाल 

सिर्फ इसलिए नहीं बांधे, 

कि ये उनके संस्कार हैं,

बल्कि इसलिए भी बांधे की

उनके भागने में कहीं 

व्यवधान ना ला दे ये चोटियां ।

देश ऋणी है उस पिता का भी,

जिसने दहेज के लिए धन इकट्ठा 

करने से बेहतर समझा,

बेटियों की उड़ान के लिए 

धन को ईंधन बनाना।

देश ऋणी है उस भाई का भी,

जिसने राखी के तोहफे के लिए 

भगाया अपनी बहन को अपने पीछे,

गांव से शहर तक,नदी से सागर तक,

पर्वत से शिखर तक,

और खुशी से देखते रहा अपनी 

बहन को बादलों के पार तक ।

देश ऋणी है उस समाज का भी,

जिसने तंग कपड़ों में बेटियों का 

सिर्फ फूहड़पन नहीं देखा,

देखा तो केवल चमकती स्वेद बूंदे।


क्षमा शुक्ला,औरंगाबाद-बिहार