स्त्री ही तो है

स्त्री स्त्री है

स्त्री बहुत कुछ है

कोई कठपुतली कहे

स्त्री कठपुतली नहीं है

वह सबको सुनती है

स्त्री सबको समझती है

उसमें अहसास है

उसमें प्यार है

कभी स्त्री माँ है

कभी स्त्री भार्या है

वह कर्तव्य निभाती है

सबकी ख़ुशी उसे भाती है

स्त्री बेटी है

स्त्री बहिन है

सबका दिल रखती है

स्त्री कठपुतली नहीं है

स्त्री है सखी भी

सखियों की बात रखी

हँसना हँसाना

सबको समझना

कभी सहना

कभी कुछ न कहना

आदत यह स्त्री की है

मिलती उसे संतुष्टि है

वह सबको जोड़ती है

वह कठपुतली नहीं है

परिवार को बनाने वाली

सबका ख्याल रखने वाली

वह स्त्री ही तो है

कठपुतली कहाँ है

अच्छा बुरा समझती है

एकता का भाव रखती है

बुजुर्गो की खांसी पर भी

उनका हाल पूछती है

सबकी ख़ुशी

उसकी ख़ुशी है

स्त्री स्त्री है

कठपुतली नहीं है


रितु शर्मा

दिल्ली