बरखा के रूप

सिर पर भारी बोझ है, 

चलने को मजबूर।

कुछ को बरखा दुख मिला , 

होते घर से दूर।।

माना बरखा है सुखदाई

कहीं-कहीं पर पीड़ा लाई।।

कितने घर बहते हैं जाते

कितना दुख देकर हैं जाते।

पानी देखो दौड़ा आता

सब कुछ साथ बहा ले जाता।।

कितने जन बेघर हो जाते।

कितने चिर निद्रा सो जाते।

यह मंजर जब देखे जाते

दुख के बादल हैं गहराते।।

राहे सारी बंद हुई है।

गतिविधि सब मंद हुई है।

कितनों ने अपना को खोया

कोई फूट-फूट कर रोया।।

सड़कों पर पानी ही पानी

कहां से लाएं राशन पानी।

तुमने  मौला क्या कर डाला

रो-रो पूछ रही है खाला।।

और कहीं पर सूखा भारी

टकटक अँखियांँ देखें सारी ।

अपना छोटा सा घर था

चाहे टूटा सा छप्पर था।।

भगवन तेरी कैसी माया

वीनू को  समझ नहीआया।

बिजली तू तो बावरी ,

बहुत किया है नाश।

घर के भीतर हम चलें ,

तेरा क्या विश्वास।।


वीनू शर्मा,जयपुर-राजस्थान