बहू को बेटी ना सही, बहू तो समझें

घर की लक्ष्मी का तुम करो गर आदर...

समाज से तुम्हें सम्मान मिले फिर सादर...

भारतीय परिवार में हर सदस्य का विशेषत:  एक स्त्री ,एक माता का सालों से बस एक यही स्वप्न होता है कि कब उसके बेटे के सिर पर सेहरा बंधेगा, कब उसकी शादी होगी ,कब वह नई नवेली दुल्हन लेकर एक नई दुनिया, एक नई जिंदगी की शुरुआत करेगा ।उसने मन ही मन अपने बेटे की शादी के अनगिनत सपने अपनी आंखों में संजोए होते हैं ।

फिर वह दिन भी आ जाता है जब घर के बेटे का रिश्ता किसी अच्छे घर की लड़की से पक्का हो जाता है और धीरे-धीरे शादी का मुहूर्त भी निकल जाता है। मुहूर्त निकलते ही शादी का आयोजन संपन्न होता है एवं नई नवेली दुल्हन का बड़े जोरों शोरों से एवं धूमधाम से सभी प्रकार के रीति-रिवाजों के साथ गृह प्रवेश कराया जाता है ।परिवार जनों के हंसी मजाक, अठखेलियों और प्यार भरी नोकझोंक के साथ विवाह जैसा पावन आयोजन संपन्न होता है। सभी रिश्तेदार नातेदार अपने अपने घर चले जाते हैं ।घर के बेटे और बहू की जिंदगी की एक नई शुरुआत के लिए घर के सभी जन उन्हें ढेरों आशीर्वाद देते हैं एवं एक सुखी जीवन के लिए भगवान से दुआ मांगते हैं ।

घर में नई सदस्य के आगमन के बाद घर में नई चहल-पहल और खुशी का माहौल बन जाता है।घर का हर सदस्य घर में आने वाली बहू के साथ अपना अधिक से अधिक समय बिताना चाहता है कुछ उसकी सुनना चाहता है और कुछ उसे अपने मन की बताना चाहता है ।जाना साथ ,आना साथ, खाना साथ, उठना साथ, बैठना साथ , बहू का हर वक्त का साथ घर के सभी सदस्यों को अच्छा लगने लगता है ।घर में आने वाली बहू का खासा ख्याल भी रखा जाता है ,उसके मनपसंद व्यंजन भी कुछ दिनों तक घर में पकाए जाते हैं ,उसको बड़े ही नाज़ और लाड़ प्यार से रखा जाता है।

परंतु यह क्या कि समय बीतने के साथ साथ घर के अधिकतर सदस्यों और ख़ास तौर पर घर की पटरानी या यूं कहें घर की महारानी जिनकी घर में सबसे ज्यादा चलती है जिनके ना और हां पर ही घर के बाकी सदस्यों के निर्णय निर्भर होते हैं ,कहने का तात्पर्य यह है कि घर की माता अर्थात सास की हां में हां और उनकी ना में सबकी ना होनी शुरू हो जाती है कुछ समय पहले आई बहू को बहू ना समझ कर काम करने वाली एक साधारण सी स्त्री के रूप में देखा जाने लगता है ।सभी घरवालों की उससे अपेक्षाएं निरंतर बढ़ने लगती हैं सास ,ननद, जेठ ,देवर ,पति और फिर घर के हर छोटे-बड़े सदस्यों की देखभाल का जिम्मा उस नई नवेली दुल्हन को सौंप दिया जाता है। किसी भी काम में कोताही बरतने का कोई स्कोप ही नहीं होता जरा सी भी लापरवाही या गलती होने की स्थिति में उसमें कमियों पर कमियां निकाली जाती हैं एवं कभी-कभी बात इतनी बढ़ जाती है कि बहू के मायके वालों को भी तानों का शिकार बनाए जाने लगता है अर्थात बहू की परवरिश पर भी सवाल उठने लगते हैं । ऐसे माहौल में बहू को दिन-रात बस यही सुनने को मिलता है कि तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें कुछ सिखा कर भेजा भी है कि नहीं। घर की हर प्रकार की छोटी बड़ी जिम्मेदारियां निभाने के बाद भी जब बहू को ऐसे चुभते शब्द अपने कानों में सुनाई पड़ते हैं तो वह अंदर ही अंदर घुट कर जीना शुरु कर देती है और कभी कभी तो स्थिति इतनी भी बिगड़ जाती है कि उसे अपनी शादी करने के निर्णय पर भी पछतावा होना शुरू हो जाता है।

दोस्तों ,अक्सर ऐसा क्यों होता है कि हर इंसान अपने स्वार्थ के तराजू में ही हर रिश्ते को तोलना शुरू कर देता है, रिश्तों को अपने हिसाब से तरोड़ मरोड़ कर इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं, घर की बहू को बाहरी दुनिया के सामने बड़े गर्व से गृहलक्ष्मी का नाम देने वाले ससुराल पक्ष के लोग घर के भीतर उसकी दुर्दशा के जिम्मेदार क्यों बन जाते हैं ,क्यों कुछ ही दिनों में घर के नये सदस्य के प्रति उनका रवैया एकदम से बदलने लगता है, क्यों उन्हें घर की बहू बहू से ज्यादा कामवाली लगने लगती है ,क्यों कुछ ही पलों में एक मासूम सी ,अल्हड़ सी लड़की सभी को इतनी समझदार लगने लगती है कि घर की हर छोटी बड़ी जिम्मेदारी उस बच्ची पर थोप दी जाती है, जिसे निभाने की वह हर हाल में कोशिश भी करती है परंतु थोड़ी कमी या गलती होने पर उसे तानों और क्रोध का शिकार बनना पड़ जाता है ।शादी के समय बहू हमारी बहू नहीं बेटी है यह कहने वाले लोग क्यों इतना जल्दी अपना रंग बदलना शुरू कर देते हैं क्यों वे बहू को बेटी तो छोड़ बहू तक का दर्जा नहीं दे पाते हैं ।क्या यह मात्र इंसानी फितरत है जो रिश्तों के मोल भाव लगाकर रिश्तों का अर्थ ही खत्म कर देते हैं ।

शायद यही कारण है कि वर्तमान में लोगों का रिश्तों से ,आपसी प्यार से विश्वास ही उठता जा रहा है ।ऐसे में अपनी संस्कृति और संस्कारों को हम सबको मिलकर जिंदा रखने की पुरजोर कोशिश करनी होगी ,अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम सभी एक दूसरे से इतना कटा हुआ महसूस करने लगेंगे कि जरूरत के समय हम स्वयं को सिर्फ और सिर्फ अकेला ही पाएंगे ।वक्त रहते संभलने से हम अपने जीवन में एक बार फिर सुखों की वर्षा की बौछार पाकर खुद को एवम अपनों को तरोताजा महसूस करा सकते हैं ।

इस लेख के माध्यम से मैं समाज के उन सभी लोगों से सादर गुजारिश करना चाहूंगी जो वक्त के साथ अपने संस्कारों के साथ भी समझौता कर लेते हैं एवं रिश्तों को ताक पर रखकर अभिमान के चलते ऐसा बहुत कुछ खो देते हैं जो उन्हें शायद जिंदगी में फिर कभी दोबारा नहीं मिल पाता। इसलिए रिश्तों को संजो कर रखिए, रिश्तों में जान डालिए, रिश्तों का इस्तेमाल करना बंद कीजिए एवं प्रेम रूपी धारा से रिश्तों को समय-समय पर सींचते रहिए।

स्नेह समर्पण भाव की होती रिश्तों को दरकार

इन्हें दूर ही राखिए मद से स्वार्थ से सरकार 

पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग

दिल्ली