नज़्म

भीगता हूँ तेरे एहसासों से 

जब तू क़रीब नही होता 

होते हैं सबनशी कोई 

तेरा चेहरा नही होता 


आ गए ग़र गलती से 

जो तेरा पैग़ाम 

ख़ाली होता है लिफ़ाफ़ा 

उसमें ख़त नही होता 


ना मिलेगा तुमको जहाँ में 

हमारे जैसा 

ढूँढ़ को ग़र यक़ीं तुमको 

अब भी नही होता 


दूर हो गए हमसे 

हुई क्या इतनी मजबूरी 

रिश्तों में फ़ासला इतना 

अच्छा नही होता 


तदबीर से बुला लो हमको 

पास अपने 

दीवानों को सताना इतना भी 

अच्छा नही होता 


सवि शर्मा 

देहरादून