पर्दा किया जाता है गैरों से

भूल पाओगे क्या . 

तुम सच बता दो हमको । 

नहीं तो फिर सलाह ये , 

हमें देते क्यों हो ?

देखा ही क्यों था हमें .

आँखों से मदभरी । 

अब होश में लाने की .

सजा देते क्यों हो ?

अदाएँ हैं ही कुछ ऐसी .

कि देखेगा ज़माना ।

नज़रों से है बचना तो . 

सज धज के आते क्यों हो ? 

पर्दा किया जाता है गैरों से .

अपनों से तो नहीं ।

सामने आते ही आँखों को ,

अपनी झुकाते क्यों हो ?

लगता है डर इतना  जो 

लोगों से  हां तुम्हें  हमदम,

दिल अपना हम से फिर .

लगाते क्यों हो ? 

गर प्यार नहीं है जो .

" मुश्ताक से तुम्हें ।

वादों को अपने फिर तुम , 

निभाते क्यों हो ? 

लिखते ही नहीं आता जो  .

" मुश्ताक " को गज़लें ।

तन्हाई में शेरों को उसके . 

गुनगुनाते क्यों हो,?


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

सहज़ हरदा मध्यप्रदेश