नारी का जीवट

जीवटता और नारी का सम्बंध,

जैसे प्रकृति का ईश से अनुबंध।

नारी रक्त में संचरित धैर्य संयम,

सृष्टि रच पूर्ण करती शाश्वत नियम।

अंतर्मन के द्वंद की निर्णायक,

सहती गर्हित आघात पीड़ादायक,

नीलकंठ सा धारण करती गरल,

मुख पर अनुभूति मनोहारी सरल।

चुभते वक्तव्यों पर करती चिन्तन,

मन में विचारों का करती मन्थन,

हृदय को छलनी करते जो हर पल,

उन्हीं का निहारती पथ पल पल।

कर्तव्य जिसके लिए ईश्वर की पूजा,

निर्विशेष रिश्ते से भिन्न कोई न दूजा,

स्वाभिमान रौंदा जाता है जिस गेह,

अमृत वचनों से भरती उस घर नेह।

कुछ क्षण निज हेतु लेती जो चुन,

तत्क्षण बन जाती स्वयं की दुश्मन,

संस्कृति सीढियां चढ़ रहा समाज,

किन्तु नारी नहीं  तोड़ पाई रिवाज।


सीमा मिश्रा,बिन्दकी-फतेहपुर

उत्तर प्रदेश