चितेरा

मैं घूम रही थी मधुवन में,

जिसका तू चितेरा है।

मैं ढूंढ रही थी मधुकुंज को

जहाँ तेरा बसेरा है।


मैं रजनी की लघुकाया,

भ्रमित थी अंधियारों में,

तू प्रकाश का उज्जवल

प्रदिप्त सवेरा है।


मैं नीर भरन गयी पनघट पर,

वहाँ प्रतिबिंब बस तेरा है।

तेरी प्रतीक्षा में रही विकल मैं,

पर तू कभी ना मेरा है।


मैंने सुनी श्वासों की प्रतिध्वनि,

झंकृत उर वीणा में सुर तेरा है।

लघु ज्योतिपुंज तेरी यादों के,

हुये प्रज्ज्वलित जहाँ घोर अँधेरा है।


प्रीत को मैंने बनाया अक्षत,

अर्पण की श्वासों की माला।

अब न ढूंढूं तुझे मैं इत उत,

तू बस मेरा,हाँ बस मेरा है।


               रीमा सिन्हा (लखनऊ)