॥ वक्त का फेरा ॥

वक्त का ये सब फेरा है

कभी शाम कभी सवेरा है

आगे जो बढ़ता जाता है

मंजिल उनको मिल जाता है


वक्त  का ये सब फेरा है

सच और झूठ का डेरा है

सच्चाई मुश्किल में जीता है

झूठे का कई एक मित्र होता है


वक्त का ये सब फेरा है

कुछ लोग यहाँ बना लुटेरा है

चोरी की नीयत से आता है

अपराध का दर्द दे जाता है


वक्त का ये सब फेरा है

इन्सानियत का लुटा बसेरा है

बेईमानों का बोलबाला है

ईमान के घर पे लटका ताला है


वक्त का ये सब फेरा है

सफेदपोश में छिपा लुटेरा है

भ्रष्टाचार की सरिता बहाता है

जनता को दिन रात रूलाता है


वक्त का ये सब फेरा है

कुछ लोग सफल सपेरा है

बीन की धुन सुनाता है

जनता को उल्लू बनाता है


वक्त का ये सब फेरा है

कोई नहीं जग में तेरा है

सज्जनता की मैय्यत निकलता है

दुरजन की डोली यहाँ सजता है


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार