तब ढूंढने लगती हूं सुकून.. बेचैन सी होकर !!

जब स्याह रात के अंधेरे

रह जाते हैं असमर्थ..बनने में "आवरण",

तब ढूँढने लगती हूं सुकून..बेचैन सी होकर !!


अक्सर खेलना चाहती हूं

कागज की नावों से,

बिखर जाना चाहती हूं

बारिश की बूंदों में,

घुल जाना चाहती हूं

रंगों मे इंद्रधनुष सी ,

सिमट जाना चाहती हूं

बूंदों में ओस की,

खोलना चाहती हूं अंधेरे..ओढ़कर धूप की चादर

तब ढूंढने लगती हूं सुकून..बेचैन सी होकर !!


झिड़क देना चाहती हूं

मान्यताएं सडी-गली,

चाहती हूं बनाना

एक राह अपनी ही ,

चाह नहीं मशहूर हो लिखती रहूं

हूं 'मनसी', मन का ही कहती रहूं

जब बदलने लगती हैं परिभाषाएं..बिना अर्थ की होकर,

तब ढूंढने लगती हूं सुकून..बेचैन सी होकर !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ