अपनी शर्तों पर काम करने का अनिल खाची को भुगतना पड़ा खामियाजा

शिमला: हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव अनिल खाची को अपनी शर्तों पर काम करने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। एक मंत्री, कुछ नेताओं और अफसरों के साथ अपनी नियुक्ति के डेढ़ साल बाद भी कानून-कायदों की सीधी लकीर पर चलने वाले अनिल खाची सामंजस्य बनाने में असफल हुए। जनप्रतिनिधियों की कई ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए ऐसे नियम बाधा बने। कोरोना संकट के चलते वित्तीय संकट से जूझ रहे प्रदेश में बेवजह के खर्च करने के लिए खिलाफ भी खाची अंगद के पैर की तरह अड़े रहे। 

अगले वर्ष विधानसभा के आम चुनाव की ओर से बढ़ रही जयराम सरकार को इस स्थिति में अनिल खाची के हाथ में नौकरशाही की बागडोर दिए रखना काफी वक्त से असहज लग रहा था। अब सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए अनिल खाची को बडे़ कूटनीतिक तरीके से साइडलाइन कर वरिष्ठ आईएएस राम सुभग सिंह से कई उम्मीदें लगाते हुए प्रदेश की अफसरशाही की कमान सौंपी है।

अनिल खाची को बीते माह कैबिनेट बैठक में मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर से हुई बहस के बाद से ही हटाने की चर्चा शुरू हो गई थी। विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में इसकी पूरी पटकथा लिखी गई। जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह की अनुपस्थिति में इस बैठक में कुछ भाजपा विधायकों और मंत्रियों ने भी मुख्यमंत्री के समक्ष मुख्य सचिव अनिल खाची की सख्तमिजाजी पर सवाल उठाए। ईमानदार छवि होने पर भी खाची पर नियम-कानून की आड़ में कार्यों को गति नहीं देने के आरोप तक लगाए गए। नेताओं-अफसरों के बढ़ते इस दबाव के चलते ही सरकार ने गुरुवार को विधानसभा सत्र के बीच खाची को बदलने का फैसला लिया।

अनिल खाची ने एक जनवरी 2020 को प्रदेश के मुख्य सचिव का पदभार संभाला था। श्रीकांत बाल्दी के सेवानिवृत्त होने के बाद खाची को मुख्य सचिव बनाया गया था। मुख्य सचिव बनाने के लिए अनिल खाची को 2019 में ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से प्रदेश में लाया गया था। बाल्दी के सेवानिवृत्त होने तक खाची ने वित्त महकमे के अतिरिक्त मुख्य सचिव का कार्यभार देखा। मूलत कोटगढ़ से संबंध रखने वाले अनिल खाची की पढ़ाई दिल्ली से हुई है।