नगर मे बने 67 कुओं मे से बचे 31 कुएं भी सुरक्षित नही

कटरा बाजार/गोंडा । भारतीय संस्कृति की उपयोगिता कही जाने वाली कुएं अपनी उपयोगिता खोती जा रही जो कभी मनुष्यो के जीवन को हरा भरा करती थी आज उन्ही मनुष्यो के मकरजाल मे दफन होती नजर आ रही है वैसे नगर पंचायत के अधिकारियों की भूमिका इसमे कम नही, कही अतिक्रमण तो कही किसी के अशियाने का शिकार बन कर रह गयी है और नगर प्रशासन हाथ पर हाथ रख कर वोट बैंक के लिए प्राकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है जबकि सरकार का आदेश है कि कुओं और तलाबो को सुरक्षित कर उन्हे सरंक्षण देना चाहिए लेकिन नगर मे तो यह दोनो अपनी अस्तित्व खोती नजर आ रही है। कुएं की महत्ता व उपयोगिता को नपा भूलती जा रही है। नगर के रामगोपाल तिवारी, शमशुलहक शाह, दयाशंकर गुप्ता व कई बुजुर्गो ने बताया कि पहले लोग कुआं खुदवाना धार्मिक कार्य व कन्यादान की भांति पुण्य कार्य समझते थे। यहां तक की गांव के धनी लोग दूसरे गांवों में भी कुएं खुदवा कर यश अर्जित करते थे। गर्मी के दिनों में राहगीरों के लिए प्यास बुझाने के लिए कुएं के नजदीक चना-गुड़ भी रखा रहता था। कुआं से पानी निकालने के लिए रस्सी लगी बाल्टी रहती थी। कई जगह बांस से तैयार ढेकुल तो कहीं कुआं के बीच घिरनी लगा रहता था। जिससे पानी निकालने में लोगों को सुविधा होती थी। लेकिन अब लोग कुएं को भुलते जा रहे है। वही कई लोगों ने बताया कि नगर के बचे कुचे अधिकांश कुएं के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। जिस तरह से लोग कुएं को कूड़ा व कचरा से भर रहे है। अगर ऐसे ही भरते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब लोग कुएं को देखने के लिए मोहताज हो जाएंगे।नगर पंचायत मे लगभग 67 कुएं थे जो अब किसी के अशियाने व अतिक्रमण का शिकार हो चुके है और नपा के रिपोर्ट के मुताबिक अब नगर मे 31 कुएं है वो भी सुरक्षित नही  प्रशाशन यह सब देख कर कोई भी कार्यवाही कर पाने की हिम्मत नही जुटा पा रही है, नगर पंचायत के अन्दर अगर कोई भी अप्रिय घटना घट जाये जैसे (आग लगना) तो अग्नि शमनयंत्र भी बिना पानी के कुछ न कर पायेगा एक रास्ता बचा था कुआं अगर बचे कुओं को सुरक्षित न किया गया तो वह दिन दूर नही जब हादसा होते हुए लोग अपनी आखों से देखेंगे मगर अपने बचाव मे कुछ भी न कर पायेगें।