"21वीं सदी की दहलीज़ पर खड़े अब स्त्री विमर्श लिखना कुछ अजीब लगता है"

अब लिखनी है स्वतंत्रता, मुखरता और स्त्री का आत्मसम्मान क्यूँकि आज महिलाएं कहाँ से कहाँ पहुँच गई है, हवाई जहाज उड़ाने से लेकर मल्टीनेशनल कंपनियों में सीईओ बनकर परचम लहरा रही है। तो अब ऐसी विवाहिता महिलाओं की शान में साहित्य को क्यूँ न सजाया जाए, जिसे पढ़कर जो गिनी चुनी अबलाएं अब भी कुएँ के मेढ़क सी छिछरे पानी में तैरने की कोशिश कर रही है वह भी समुन्दर लाँघने की हिम्मत कर जाएँ।  

आजकल की लड़कियां शादी के बाद खुद को हरगिज़ नहीं बदलती। बेशक ससुराल के सांचे में ढ़ल जाती है, पर अपना आकार बरकरार रखकर। वो अपनी खुशी का पहले ख़याल रखती है, जो अच्छा लगे वो करती है। खुद के साथ समय बिताना जानती है, खुद का ख़याल रखना जानती है। घर परिवार का ख़याल रखते खुद को क्षीण नहीं कर लेती।

अपनी गरिमा को निखार कर अपना वजूद प्रस्थापित करना जानती है।

आज की महिलाएं दम रखती है परिवार के साथ अपनी करियर को भी बखूबी संभाल लेती है, पति के बटुए पर निर्भर नहीं जब तक पाँच पच्चीस हज़ार कमा नहीं लेती शादी करने का सोचती भी नहीं। और नौकरी करते हुए भी घरकाम और ऑफ़िस वर्क में तालमेल बिठाकर सुबह से शाम दौड़ती रहती है। और पति से भी ज़्यादा कमाने वाली कुछ औरतें जाताती भी नहीं, और पति के कंधे से कंधा मिलाकर अपना हर फ़र्ज़ निभाती है।

आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपना लोहा मनवा रही है। बड़ी पदवी पर बैठकर विवाह के प्रतीक जैसे सर पर पल्लू, चुटकी सिंदूर, और गले के मंगलसूत्र को तिलांजली देकर अपनी पसंद के कपड़े और जेवर चुनकर भी फ़ेरो का मान रखना जानती है।

साथ ही अपने विचारों पर कायम रहते किसी ओरों के थोपे नियमों के साथ ना समझौता करती है न दब कर अबला बेचारी बनकर उम्र काटती है।

और मायके का मान रखते अपनी सरनेम तक नहीं बदलने की हिम्मत रखती है। या तो ससुराल की सरनेम के आगे पिता की सरनेम भी जोड़ लेती है, आज की लड़की अपनी जड़ को सूखने नहीं देती।

आगे देखें तो परिवार नियोजन को अपने हाथ में रखते बच्चे कब पैदा करनें है, कितने करने है का निर्णय अपने हक में रखकर आय के हिसाब से समय आने पर ही प्रेग्नेंसी का प्लान करती है।

और आख़िर में एक अहम मुद्दे को अपना फ़र्ज़ समझती है, वो है अपने माता-पिता की ज़िम्मेदारी लेना। जी हाँ विवाहित महिला अब अपने पेरेन्टस की ज़िम्मेदारी लेने से बिलकुल नहीं कतराती। शादी के बाद माँ-बाप को साथ भी रखती है, और देखभाल भी करती है।

नहीं डरती पितृसत्तात्मक समाज से मोहताज जो नहीं रही, अपने दम पर पैरों पर खड़ी है। 

पर शायद अब भी ये सारी बातें 60 प्रतिशत महिलाओं को लागू होती है। समाज में आज भी कुछ औरतें बेचारगी सहते प्रताड़ित होती ही रहती है। विमर्श को पूर्णत: तिलांजली देना मुमकिन ही नहीं। पर जो जितनी महिलाएं 18वीं सदी की विचारधारा को लाँघकर आज़ादी कि साँसे ले रही है उन सबकी हिम्मत को सौ सलाम। कहने का मतलब है परिवर्तन को अपनाओ, सहना बंद करो और अधिकार जमाकर दमन करने वालों के खिलाफ़ विद्रोह की लाठी चलाओ और अपना सम्मान करवाना सीखो। स्त्री संसार रथ की सारथी है अपने अस्तित्व को पहचानो।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु