मै हूँ एक पहेली सी

मैं हूँ एक पहेली सी,

तू मुझे सुलझता 

आप उलझ जाऐगा।

दुशमनी  ना कर मुझसे तु

दोस्ती में साथ दूर तक पायेगा

अगर समझना मुझको चाहते हो 

तो वक्त निकालो और 

बतलाओ मेरे साथ

दो सुख -दुख मैं बतलाऊंगी

चार तेरा भी सुन जाऊंगी

यही तो होती है 

इंसानियत की पहचान।

क्युं पूछते हो दूसरों से 

मेरा हलचाल?अरे वो क्या 

बतलायेगा मेरा हालचाल?

स्वयं को उपर रखने का खातिर

वो मझको तेरी नजरों में 

गिरायेगा और ऐसा कर तू भी 

मेरे दिल से उतर जायेगा 

कौन किसी को उपर देखना चाहे?

सब अपने  ही खून को सरहाये ।

भले छुआ हो तूने चांद को पर

दागदार को छूने को पाप लगाये।

निष्पक्ष्ता की आशा मिथ्या मात्र है।

मुंह में राम बगल में 

छूरी ये तो संसार है।

इसलिये खुद को थोड़ा 

सच्चा बनाने हेतु

मैं अपने वक्त को लगाऊं

ना कि किसी और के पास

तेरे चरित्र की पहचान पूछने जाऊं।


प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल

बिराटनगर-नेपाल

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