साहित्य के चाँद प्रेमचंद

प्रेम की क्षीर सलिला बहाते चले,

चाँद की चाँदनी से भिगाते चले।

गाँव की माटी चन्दन बनी भाल का,

हलधरों से कलम को सजाते चले।

पूस की रात हल्कू न हलकान हो,

इसलिये अग्नि ज्वाला जलाते चले।

दीन की दीनता कर्म की हीनता,

नारी की दुर्दशा को बताते चले।

मूक पशुओं की भाषा हृदय में बसी,

हीरा मोती सी जोड़ी बनाते चले।

क्रान्ति का बीज नारी हृदय में जले,

तीली माचिस कलम को बनाते चले।

निर्मला की व्यथा जालपा की कथा,

नीति नियमों के मुक्ति दिलाते चले।

होरी के साथ धनिया की जोड़ी बना,

सभ्यता की धुरी क्या बताते चले।

ग्राम जीवन को रोशन दिये सा किये,

जन को दिनकर सा रस्ता दिखाते चले।

प्रेम ने प्रेम से बाँधा है प्रेम को,

लेखनी का उजाला फैलाते चले।

सीमा मिश्रा,बिन्दकी-फतेहपुर,

उत्तर प्रदेश