बंद मुट्ठी

कभी देखी नही मेरी नर्म कोमल बंद मुट्ठी 

जिसमें सारी की सारी रेखाए 

कर दी थी  क़ैद 

तुमसे सुलह के लिए 

था इन लकीरों में मेरे  बढ़ने का रास्ता 

उन रास्तों पर तुम्हारी ज़रूरत 

नही थी मेरी पहचान के लिए 

मेरी पहचान मेरे पुरुषार्थ से मिलती 

पर देख मेरा साहस 

खीचने लगे तुम लक्ष्मण रेखा 

समझाने लगे मेरी हद 

किससे डर गए थे 

मैं तुमसे कोई मुक़ाबला 

नही कर रही थी 

अपने प्रयास किसी को हराने के लिए नही 

उसमें बहुत कुछ सिंचित रहता है 

आने वाली पीढ़ी के निहितार्थ 

पर तुम्हें शायद भविष्य नही 

सिर्फ़ अभी आज की चिता है 

प्रस्फुटित मन के अविरल प्रवाह को 

नही ले जाना चाहते 

तुम युगों तक 

कि निर्माण हो एक 

स्वस्थ समाज स्वस्थ पीढ़ी का 

कैसे सोच सकते हो जब 

गाड़ी का एक पहियाँ ही जंक 

लगा होगा तो चलने में 

कर्णभेदन ह्रदय विदारकध्वनि 

का घर्षण विस्फोट नही करेगा 

उग सकता है बंजर धरती पर 

अंकुर यदि पानी अपनी तरलता बनाए रखे 

मैं और तुम हम हो 

जीवन के आदि और अंत के 

मध्य का एक मंत्र 


सवि शर्मा 

देहरादून