चुप होती हुई स्त्री..


एक चुप होती हुई स्त्री कहती है बहुत कुछ..

तुलसी जताती है नाराज़गी

नही बिखेरती वो मंजरी ,

सारी फुलवारियां गुमसुम हो जाती हैं

घर की ,

कनेर.. सूरजमुखी..

सबके चेहरे नहीं दिखते

पहले जैसे ,

छौंका-तडका हो जाता है और भी तीखा

रसोईघर में ,

नहीं मोहती ज्यादा

भीने पकवानों की खुशबू 

और..

दूध उफन बाहर आता है रोज़ !!

एक चुप होती हुई स्त्री..

मानों , पृथ्वी का रुके रह जाना

अपनी धुरी पर !!

एक चुप होती हुई स्त्री..

लांघती है मन ही मन

खोखले रिश्तों की दीवारें 

और प्रस्थान कर जाती देहरी के बाहर

बिना कोई आवाज किए हुए ही !!

एक चुप होती हुई स्त्री..

और भी बहुत कुछ सोचती है ,

वह "आती" तो है 

हां, उसे आना ही पड़ता है ,

पर, वह फिर कभी नहीं लौटती

"पहले की तरह" !! 

नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ