"बचपन की यादें "

मेरी आँखे से गुजरी जो

बीते लम्भो की परछाईं, 

न फिर रोके रुकी ये आँखे

झट से भर आई। 

वो बचपन गुज़रा था जो

घर के आंगन में लुढ़कता सा, 

मै भींगी करती थी जिसमें

वो सावन बरसात सा, 

याद आई मुझे

माँ ने कही थी जो कभी कहानियाँ सुनाई

न फिर रोके रुकी ये आँखे, 

झट से भर आई। 

उम्र छोटी थी पर सपने बड़े थे

ये दुनिया प्यारी न थी, 

हम तो बस खिलौने पे मरते थे

जब देखा मैंने वो बचपन का खजाना। 

किताब, कलम और स्याही

न फिर रोके रुकी ये आँखे

झट से भर आई। 

याद आया मुझे;

भाई -बहनों के संग झगड़ना

शैतानियां करके माँ के

दामन से जा लिपटना, 

साथ ही याद आई तो बातें

जो माँ ने थी समझाई, 

न फिर रोके रूकी ये आखें

झट से भर आई। 

आज तन्हाई में जब

वो मासूम बचपन नजर आया है, 

ऐसा लगता है जैसे

खुशियाँ ने कोई गीत गुनगुनाया। 

पर जब दिखा सच्चाई का आइना

तो फिर हुई रूसवाई, 

न फिर रोके रुकी ये आखें

झट से भर आई । 

-कुमारी जूही

(रोसरा, समस्तीपुर)