गुरू महिमा

गुरू बिन ज्ञान मिले न रे भाई,

इधर-उधर तू लाख भटक ले,

मिले  न  कोई   और  सहाई।

माता-पिता ही  प्रथम गुरू हैं,

उनसे  ही    मिले  सद्ज्ञान ।

जीवन बगिया  महक उठेगी,

होगा     सबका    कल्याण।

उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर,

उनको सम्मानित जीवन दें।

उनके चरणों में शीश नवाएं,

आशीर्वाद से झोली भर लें।

संस्कार  ले   उत्तम - उत्तम,

सबको प्यार भरा जीवन दें।

सबके दु:ख-सुख के साथी बन,

निश्छल भाव से सेवा करें।

गुरू का अर्चन, गुरू का वन्दन,

गुरू  की  महिमा  गाएं ।

गुरू  बिना  सब  जग  सूना,

उनसे  नव  जीवन  पाएं।

सदा उनके चरणों में शीश नवाएं।


अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, उ०प्र०