प्लेसमेंट

                                          " खुशियाँ ही खुशियाँ हो दामन में जिसके क्यों ना  ख़ुशी से -- "गुनगुनाते हुए राहुल अपना सामान पैक कर रहा था । कॉलेज -कैम्प्स में अच्छी प्लेसमेंट और घर जाने की छुट्टी सोने पे सुहागा ।

" हमें भी याद करना यार? घर जाकर भूल मत जाना" रितु ने  उदास लहजे में कहा ।

"अरे नहीं-- चलता हूँ ट्रैन का समय हो रहा है। "

घर पहुँचते ही राहुल ने सभी के पाँव छुए ।

संयुक्त -परिवार था भरा-पुरा भाई -बहन दादा -दादी सभी का प्यार और आशीर्वाद मिला ।

आराम कर बेटा  फिर बात करते है ? माँ ने कहा ।

राहुल  को चैन कंहाँ  , मोटरसायकिल उठाकर अपने छोटे से शहर का चक्कर लगा लाया , कभी बचपन उन्ही गलियों में बिता था ।

अचानक राहुल की नजर बगल वाले आटे-और तेल की चक्की पर पड़ी सुरेश चाचा ही तो हैं कितने बूढ़े हो गए हैं।

 अभी भी पुरानी वाली चक्की कुछ नहीं ? ।

छोटा सा शहर कुछ लोग गृह-और कुटीर उद्योग लगाकर अपनी जीविका चलाते थे , राहुल देखकर सोच में पड़ गया ।

उसने यांत्रिकी- इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ-साथ बिजनेस-मैनेजमेंट की भी पढ़ाई की थी ।

अपने शहर के लोगों को खुशहाल बनाने का सपना तभी पूरा  होगा जब इन्हें  उन्नत तकनीक अच्छी किस्म की  मशीन मिले ।

एक अच्छा सा "गुरु " जो बने सामानों का बाजार में बेचने की व्यवस्था करवा सके । "

नहीँ तो सारे कामगारो के मेहनत 

पर "पानी फिर जायेगा"।

अब वह काफी खुश था , मैं अपना पहला "प्लेसमेंट अपने शहर वाले के साथ करूंगा पैसे के साथ "खुशियों " का भी मैनजमेंट होगा"।

अनीता मिश्रा "सिद्धि" । 

पटना बिहार।