"अखबार एक सशक्त माध्यम"

समाज के हर मुद्दों को बेबाकी से  उजागर कर आईने की तरह प्रतिबिंबित करता है अखबार। एक सेतु रचकर गाँव से लेकर शहर तक हर छोटी बड़ी घटना को घर घर पहुँचा देता है। मानों जन-जन की आदत है अखबार। हर इंसान की सुबह की चाय का साथी, जब तक हैड लाईन पढ़ नहीं लेते मन बेकल रहता है। राजनीति, महामारी, महिला सशक्तिकरण, खेल जगत, कॉर्पोरेट जगत या बोलीवुड हर क्षेत्र के किस्से से लेकर देश के हर कोने से खबरें इकठ्ठा करके चार से लेकर आठ दस पन्नों के भीतर गागर में सागर सा समाविष्ट करके चटपटे चाट से समाचार परोस देते है।

संदेशों के आदान-प्रदान में लगने वाले समय और दूरी को पाटने के लिए ही मनुष्य ने संचार के माध्यमों की खोज की। संचार और जनसंचार के विभिन्न माध्यम टेलीफ़ोन, इंटरनेट, फ़ैक्स,  रेडियो, टेलीविज़न और अखबार आदि के ज़रिये मनुष्य सांस्कृतिक और मानसिक रूप से एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। हर पत्रकार अपना फ़र्ज़ बखूबी निभाते किसी भी घटना की तह तक पहुँच कर अखबार की सुर्खियां बना लेते है। न्यायतंत्र को झकझोरना हो या आम इंसान की समस्या हो, बलात्कारी का पर्दाफाश करना हो या राजनीतिक षड्यंत्र हो, अखबार की हैड लाईन बनते ही झूठ सच में परिवर्तित होना शुरू हो जाता है। मृत्यु नोंध से लेकर विज्ञापन और ज्योतिष से लेकर संपादकीय आलेखों से सजा अखबार समाज का दर्पण होता है। अब बात करें स्त्री सशक्तिकरण में मीडिया का महत्व तो

वैसे तो आजकल महिलासशक्तिकरण के लिए हर कोई मुहिम जगा रहा है, उसमें से एक मजबूत  माध्यम है अखबार  अखबार आज एक सशक्त माध्यम बन गया है। अखबार महिलाओं को अपने दृष्टिकोण और अपनी राय को सामने रखने का एक मंच प्रदान करता है जो काबिले तारीफ है। कहीं पर भी महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को समाज के सामने पल भर में उजागर कर देता है। साथ ही महिलाएं क्या महसूस करती हैं, समाज के बारे में उनकी क्या राय है, किन-किन चीज़ों में वे बदलाव चाहती हैं, यह बातें महेत्वपूर्ण हो जाती हैं जब महिलाएं अपने विचारों को सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करती हैं। रूढ़िवादी सोच वाले समाज में महिलाओं को अपनी राय रखने का मौका नहीं दिया जाता, लेकिन अखबार ने इस बंदीश को तोड़ा है महिलाओं को सशक्त महसूस करवाने में अपना शत प्रतिशत  योगदान दिया है। साहित्य के लिए कुछ पेज आरक्षित रखकर महिला लेखिकाओं को अपनी बात रखने का मौका देता है।

सोशल मीडिया के ज़रिये महिलाएं खुद को ही नहीं बल्कि अन्य महिलाओं को भी सशक्त कर रही हैं। वह अपनी प्रगति और उपलब्धियों को जब सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं, तो अन्य महिलाएं भी उन्हें देखकर आगे बढ़ने का प्रयास करती हैं। 

महिलाओं के मुद्दे कभी भी पहले इतने चर्चा में नहीं होते थे जितने आज हैं। यह मीडिया के कारण ही है। आज अगर किसी पर तेजाब फेंकने घटना होती है, किसीके साथ बलात्कार होता है या कोई भी अन्याय होता है कैंडल मार्च और अखबार की सजगता की वजह से  आरोपी जल्द से जल्द सलाखों के पीछे होता है। छेड़खानी बलात्कार या प्रताड़ना जैसी घटनाएं मीडिया के द्वारा प्रकाशित करने पर न्यायिक प्रक्रिया भी गतिवान बन जाती है। तभी तो मीडिया कहे या अखबार ये संचार माध्यम लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु