पक्ष विपक्ष और संबंध

पक्ष- विपक्ष हर व्यक्ति की जिंदगी से जुड़ा है।इस तरह से और उस तरह से।

पक्ष -विपक्ष की भावना तो हम बच्चों में भी देख सकते हैं।भले ही वह पसंद के रूप में क्यों न हो।आप देखिए यदि दो व्यक्ति एक बच्चे को अलग-अलग तरह की चॉकलेट देते हैँ।शायद बच्चा किसी चॉकलेट को कहे कि वह यह चॉकलेट नहीं खाता। दूसरी वाली खाता है।रंगों का मामला हो या खेल का मामला।कहीं न कहीं हम इस भावना को देख सकते हैं।

कई बार होता है कि कोई व्यक्ति कुछ खरीदने से पहले दो लोगों की पसंद पूछता है।दोनों लोग अलग-अलग पसंद बताते हैं।पर खरीदने वाला व्यक्ति उन दोनों में से एक को चुनता है।यह सब क्या है?यही पसंद तो पक्ष -विपक्ष का रूप ले लेती है।पक्ष -विपक्ष जीवन के हर पहलू से जुड़ा है। किसी को कुछ अच्छा लगता है। तो किसी को कुछ।कोई धार्मिक स्थलों पर जाना पसंद करता है।तो कोई ऐतिहासिक स्थलों पर जाना पसंद करता है।किसी को बहुत पैसा होने पर भी भ्रमण पर खर्च करना ही नहीं है।

पसंद -नपसंद,पक्ष -विपक्ष के साथ -साथ हम अंधता भी देखते हैं।उस व्यक्ति को जो करना है वह करना है।अगर कोई सलाह देगा नहीं मानेगा वह।क्योंकि वह बात दिल और दिमांग पर अंकित हो गई है।

इसी तरह संत आदि के बारे में भी होता है।यदि किसी संत का जमाना विरोध करे।पर जिसे उसे पूजना है तो पूजेगा।अगर किसी ने उसके मुंह पर बुराई कर भी दी तो वह लड़ने को उतारू हो जाएगा।पर बाकी लोग सिर दर्द क्यों लें।

धैर्य से काम लें।दिल की बात कह कर बिगाड़ लेते हैं रिश्ते। किसी को गाय पालना पसंद है। किसी को कुत्ता।और कोई बकरी पालना पसंद करता है। अरे क्यों न हो ऐसा आखिर पसंद -नपसंद है।

यह सब बात प्रसिद्ध व्यवसायियों और कंपनियों पर भी लागू होती हैं। जिस को जो पसंद है वह पसंद है।अब घड़ी सर्फ़ विज्ञापन में नंबर वन बता दिया जाता है।पर सभी लोग तो इस बात का पक्ष नहीं करते।कोई कहता है मंदिरों को दान दीजिए तो कोई कहता है गरीबों को दान दीजिए। भाई पसंद है अपनी-अपनी।सोच है अपनी-अपनी।नजरिया है अपना-अपना।बस जरा सी बात पर मनमुटाव कर लेते हैं।

क्या यह ठीक है?आखिर काहे? बस कुछ लोगों को बहस करने का आनंद भी चाहिए। न जाने कितने पहलू हैं जो पसंद -नपसंद,पक्ष -विपक्ष से जुड़े होते हैं।

चलिए देखिए राजनीति की बात।गली -मोहल्ला हो या बाजार,कहीं भी बहस हो जाती है।किसी को कोई पार्टी पसंद है तो किसी को कोई।पानी डाले से बहस शांत न होय।जीभ थके तभी शांत होय।सुनने- देखने वालों को बड़ा आनंद आता है। पसंद कोई कोई पार्टी करो पर लड़ो मत। सोशल मीडिया पर अपनी अपनी पसंद दिखाने में बड़ी तारीफ समझते हैँ।एक दूसरे की पसंद वाली पार्टी की जमकर बुराई करते हैं।

पर इससे क्या होता है।कुछ नहीं।विचार देखना है तो पोस्ट देखें।सभ्यता देखनी है तो प्रतिक्रियाएं। बेबजह भिड़ने में आनंद आता है।

कोई पार्टी बदलने में शान समझता है तो कोई इतना अंधा हो जाता है कि तनिक धैर्य नहीं रख पाता। उनकी बजह से लड़ जाता है। कुछ हमारे कर्तव्य हैँ जैसे मत देना।  दूसरों को जागरूक करना।

दोस्त -दोस्त न रहा बस जरा सी देर लगती है। जिसको जो पसंद हो उसे माने।पर भाई रार क्यों ठाने।कुछ बच्चों से भी सीखो।बच्चे आपकी पसंद नपसंद करते हैं तो क्या आप उनसे नफरत करेंगे?नहीं न। इसलिए आपसी बैर न करें।

पक्ष -विपक्ष तो चलता रहता है।यह तो हमने देवताओं के जीवन में भी देखा। सकारात्मक सोचें।पक्ष -विपक्ष के चक्कर में रिश्ते न तोड़ें।  विश्वास बना रहने दें।

आपकी पसंदआपका पक्ष

खूब करिए पक्ष विपक्ष

पर गांठ न डालिए मित्रता में

रार न पालिए रिश्ता में।।

पूनम पाठक बदायूँ