थिरकता सावन

दिल्ली के जाम में सुनीता फंसी थी, फ्लाइट का समय हो रहा था, बहुत परेशान हो रही थी। किसी तरह एयरपोर्ट पहुँच कर सब औपचारिकता पूरी की, फिर प्लेन में अपनी सीट पर बैठ गयी। अचानक उसे चक्कर आने लगे, एयर होस्टेस को बुलाया, उसने पानी दिया। कुछ ठीक लगा।

सुनीता के बगल वाली सीट पर एक सज्जन थे, कुछ देर बाद बोले, "राजेश मेरा नाम है, आपको कही देखा है, ऐसा लग रहा है, क्या नाम जान सकता हूँ?"

और सुनीता, राजेश एक दूसरे को पहचान गए, 40 साल पहले दोनो पड़ोसी थे, दोनो के परिवारों में अपनापन था।

एक बार सावन की तीज के दिन बरसते पानी मे दोनो का मन और तन दोनो भीगा था और दोनो ये गाना गा रहे थे.......बरसात में तुमसे मिले, हम सनम बरसात में

उसके बाद जैसे ही राजेश के फौजी पापा को अंदेशा हुआ, उन्होंने दूसरे शहर में ट्रांसफर लिया और फिर दोनो कभी नही मिले।

सुनीता हाई ब्लड प्रेशर की मरीज थी, किसी तरह यात्रा पूरी की, अब राजेश से बोली, "मुझे बस में बिठा दो, बस्ती जाना है।"

राजेश ने कहा,"तुम्हारी तबियत ठीक नही, आज मेरे साथ होटल में चलो, दो रूम बुक कर लेंगे, कल सुबह चले जाना।"

और होटल में मजबूरीवश उन्हें एक ही होटल में रुकना पड़ा, फिर आज सावन की तीज का दिन था, दोनो को याद आया, तेज़ बारिश हो रही थी, और दोनो उस गाने को याद करके हंस रहे थे और सावन की फुहारों में खो गए थे।

नैनो ने दोनो से कहा,"बड़े मुश्किलों से आज फिर मिले है, थोड़ी देर के लिए दिमाग लॉक करो और दिल खोलो, फिर कल सुबह इसी कमरे में यादों को दफन करके अपनी जिम्मेदारियां निभाएंगे।"


स्वरचित ✍️

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर