---- प्रेंम जाल ----

सार प्यार  में  होता  है 

पढा  था  किताब  में 

बिना  सोचे  प्यार करोगे 

तो  नैय्या ड़ूबेगी बीच में 


प्रेंम  जाल  में  ऊलझ 

बैठा  जा  के  बाग  में 

प्रियसी आने वाली थी 

बादा किया था फोन में 


बेचैनी  का  आलम  था 

ऊमंगो  का  घेरा  था 

मिलने का जब समय हुआ 

तो  मम्मी  आई  साथ में 


देख  साथ  में  मम्मी  को 

नौ दो  ग्यारह  होना चाहा 

तभी  बुलावा  उसका  आया 

बोली  आ  बैठो  साथ  में 


चक्कर  मन  मिलने  का  था 

पर प्रेंम जाल में ऊलझ गया 

बिन  चाहे  बांध  दिया  हमें 

शादी  जैसे  बंधन  में 


दो चून की रोटी के खातिर 

झूँथी  कविता  लिखता  हूँ 

झूठे  गीत  सुनाता  हूँ 

छूपा  दर्द  को  सीने  में 


प्रेमजाल जंजाल  बन गया 

फंस  गया  हूँ  परिवार  में 

बिना  सोचे   प्यार  करोगे 

तो  नैय्या  ड़ूबेगी  बीच  में 


---  वीरेन्द्र  तोमर