जाग जाग हे प्रभात

जाग जाग हे प्रभात,

प्रचंड वेग की चला वात।

है सुसुप्त दिग दिगंत,

है सुसुप्त दिवा यामिनी।

रूधिर में दौड़ जा तू ,

शोणित बन के चल साथ।

जाग जाग हे प्रभात...


है घड़ी कठिन बहुत,

आलस्य को तू दे त्याग।

हिमाद्रि के उत्तुंग शिखर पर ,

किरणों की कर बरसात।

बिन रुके,बिन थके चलता जा,

संभावनाओं की ज्वाल में तपता जा,

उर में मत रख कोई अवसाद।

जाग जाग हे प्रभात...


मंज़िल का होता नहीं कोई ठौर,

मत घबरा देख दुर्गम राहों की ओर।

तृप्ति मुसाफ़िर की पहचान नहीं,

मृतप्राय सम रुकना तेरा काम नहीं।

बढ़ता जा तू,तुझे पुकारे नक्षत्र का छोर,

है चट्टान वही जो सहता है आघात,

जाग जाग हे प्रभात...


अचला का आँचल जीर्ण शीर्ण है,

वेदना की वेदी पर आसीन है।

गहन निद्रा से अब जागना होगा,

तुझे मार्तण्ड से सुधा माँगना होगा।

भाग्य को कोसकर बहुत दिन जी लिए,

कर्म की बलिवेदी पर अब तपना होगा।

तू कठोर,तू अटल, तू ही है मृदु गात,

जाग जाग हे प्रभात...


रीमा सिन्हा(लखनऊ)