ज़िंदा है अभी भी उसका वज़ूद

 तीसरी लहर में इस दुश्मन को, अब हावी मत होने देना,


बहुत खो चुके हम अपने, किसी और को नहीं अब खोना,


कुछ समय और हमें संयम का हाथ थाम कर रखना होगा,


धैर्य के मोतियों को जीवन की माला में पिरोए रखना होगा,


मरा नहीं अभी भी हमारे बीच मौजूद है, दुश्मन का वज़ूद,


छिपकर फिर हमला करेगा मिटाने आया वह हमारा वज़ूद,


आधी लड़ाई लड़ चुके हम, परन्तु आधी अभी भी है बाक़ी,


आ ना जाए बनकर आँधी, उड़ाकर ले ना जाए हमारे साथी,


पिछली दो लहरों में उसने, कितना घातक था आघात किया,


ग़लतियाँ दूसरों के सर मढ़, हमने अपना पल्ला साफ़ किया,


ग़लतियाँ अभी भी हमारे द्वारा, फिर से जो दोहराई जाएँगी,


कीमत चुकानी होगी, ना जाने कितने अपनों की जान जाएगी,


कितने अनाथ हुए देश में, बिखर गए कितनों के यूँ ही सपने,


कुछ जीवित होकर निर्जीव से हैं, खो गए उनके कितने अपने,


धिक्कार है जो अपनी ग़लती से, हम अपनों को छोड़ चले जाएँ,


धिक्कार है जो हमारी ग़लती से, अपने दुनिया से मुँह मोड़ जाएँ,


तो अपने और अपनों की ख़ातिर, सावधान हमें रहना ही होगा,


एक भी चिराग अब बुझने ना पाए, ये संकल्प हमें करना होगा।

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)