साधु ऐसा चाहिए...

 अब साधु बनने का नया ट्रेंड चल पड़ा है। पहले बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर बनने की इच्छा व्यक्त करते थे। इसमें पैसा भी बड़ा खर्च होता था। डॉक्टर, इंजीनियर बन भी गए तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि धंधा चलेगा या नहीं। किंतु साधु बनने के अपने ही मजे हैं। न पढ़ाई की चिंता न लिखाई की। दो-चार पुराने प्रवचनों की सीडी-वीडी देख ली। हू-ब-हू उसी तरह के प्रवचनों में अपनी स्टाइल का तड़का डाल दिया तो फिर कहने ही क्या। धंधा ऐसा चल पड़ेगा मानो टोल फ्री हाईवे पर मक्खन की तरह सरपट दौड़ती एसयूवी कार। आज के समय में साधु बनने के कई लाभ हैं। इनका चोला इतना गेरुआ हो चुका है कि ट्रेन में बिना टिकट सफर करने पर गरियाने की भी हिम्मत नहीं होती, क्योंकि टीटीई भी तो बाल-बच्चे वाला है। जान है तो जहान है। पहले साधुओं के कमंडल में श्राप देने के लिए जल भी नहीं होता था, अब तो पूरी की पूरी सरकार है। थोड़ी भी ऊँच-नीच हुई तो स्टेशन पर मारा-मारी, अफरा-तफरी मच जाने की प्रबल संभावना होती है। इसी बहाने एक धर्म के प्रति सहानुभूति लहर फैल जाती है। ऐसे में वहाँ चुनाव हो जाएँ तो कहने ही क्या।


ऐसा नहीं है कि साधु बनने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती। मेहनत तो करनी पड़ती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह के साधु बनना चाहते हैं। सच्चा साधु बनने के लिए अधिक मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके लिए आपको निर्जन, शांत कोना चुनना पड़ता है और लग जाना पड़ता है तपस्या में। कहते हैं सच्चे साधुओं की साधना ठीक उसी तरह होती है जिस तरह गौतम बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, रैदास, कबीर, तुलसी की होती है। यदि आपने इन महानुभावों की तस्वीरों को गौर से देखा है तो ठीक है, नहीं तो आज देख लीजिए। आप देखेंगे उनके कपाल पीछे पीले रंग का बड़ा सा आभा मंडल होता है। ऐसा ही कुछ सच्चे साधुओं के साथ होता है। जहाँ तक ओरिजिनल से लगने वाले डुप्लीकेट साधु बनने की बात है तो यह बहुत कठिन और परिश्रम वाला काम है। इसके लिए सबसे पहले आपको देशभर के तीर्थस्थलों का भ्रमण करना पड़ता है। वहाँ के मठों-अखाड़ों में साधुओं की राजनीति को करीब से देखना पड़ता है। जितना देखोगे उतना समझोगे। देश की असली राजनीति मठों, मदरसों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों में ही तो होती है। वहाँ पर मठाधीश बनने के लिए गलाकाट होड़ लगी रहती है। कहने को तो है प्रार्थना का मंदिर लेकिन प्रार्थनाओं से अधिक टाँग खींचने, कान काटने का काम ही अधिक चलता है। सच्चाई तो यह है कि यहाँ मठाधीश बनने से आसान देश का प्रधानमंत्री बनना है।


साधु तो साधु होता है। फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र में जाए अपनी आध्यात्मिक छवि से सबको प्रभावित किए बिना नहीं रह सकता। यही कारण है कि मीडिया या पुलिस कोई भी इनके पास जाने से पहले लाख बार सोचता है। यदि वे व्यवसाय में जाते हैं तो इनके द्वारा बनाए सभी उत्पादों पर आध्यात्म का लेप लगाकर अंध भक्तों को खरीदने पर विवश कर दिया जाता है। स्थिति यह हो जाती है कि फलाँ साधु जी का उत्पाद न खरीदने पर भक्त के धर्म पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया जाता है। हमारे देश की खासियत यह है कि यहाँ लोग संविधान से ज्यादा साधुओं और उनके अंधविश्वासों से डरते हैं। यदि संविधान देश की नियम पुस्तक न होकर धार्मिक ग्रंथ होता तो शायद इसका अमल अच्छे से होता। इतना तो मानना पड़ेगा कि संविधान हमारे धार्मिक ग्रंथों से न्यून है। नहीं तो न्यायालयों में संविधान की बातों का पालन करवाने के लिए धार्मिक ग्रंथों की शपथ थोड़े ही न दिलाते। यदि साधु राजनीति में आ जाए तो कमाल, धमाल और मालामाल हो जाए। साधु सत्तारूढ़ होने पर लाख गलत फैसले करे, लेकिन उस पर कोई उँगली उठाने की हिम्मत नहीं करता। क्योंकि उनका सोशल मीडिया ब्रिगेडियर इन सब पर हमला करने के लिए तत्पर रहता है। साधु अविवाहित होता है। निस्संतान होता है। यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता होती है। आज देश की सत्ता पाने का सबसे बड़ा गुरुमंत्र भी यही है। यही कारण है कि आज सांसारिक बंधनों में बंधकर रहने वाले लोग भी अविवाहित रहकर देश का उद्धार करने की बाट जोह रहे हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657