जीने का सामां कर दे

बारिशे मौसम है कुछ 

तो नवाज़िश कर दे,

दूरियां न बढ़ा फासले 

का दूर पर्दा कर दे,

बेचैन कितने हैं  सब 

फुल मेरे अरमानो के,

आ जा आकर  सेहरा

को तू गुलशन कर दे,

रंगत  खुशनुमा हो गई

जहाँ की बारिश में,

मिला नज़रें मुझसे मेरे 

जीने का सामां कर दे,

बेताबियाँ ,बैचेनियाँ ,

बताऊँ मैं कहो किसको,

आ भी जा मेरे  दिल की 

दूर  ये खलिश करदे,

क़दम खुद बखुद बढ़तें हैं 

तेरी जानिब, मुश्ताक़,

रहम कर मसीहा होश

की कोई तो दवा  करदे,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,,,,

सहज़ हरदा,,,,,,,,,,,,,

मध्यप्रदेश,,,,,,,,,,,,,,,