नए जमाने के नीम हकीम

“मैंने आपकी जाँच रिपोर्ट देख ली है। आप सुबह-शाम ‘तुरंतोफिल’ की दो गोलियाँ लीजिए। लापरवाही मत बरतिए। कुछ दिनों के लिए चिंता करना और सबसे जरूरी फोन का उपयोग कम कर दीजिए। हो सके तो रात के समय खाना खाएँ न खाएँ डाटा तो बिल्कुल मत खाइए। वरना आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।“ आँखों पर कम और नाक पर ज्यादा सुस्ताता चश्मा लगाए मरीज की ओर देखते हुए डॉक्टर ने कहा।

मरीज का नाम डॉ. रोगी था। वह भी डॉक्टर था। अंतर केवल इतना था कि उसने एमबीबीएस के बजाय एनडीबीएस की पढ़ाई की थी। यहाँ एनडीबीएस का मतलब हैः नेट डाटा बेस सर्च। ऐसे मरीज आधी सी ज्यादा बीमारियों का इलाज गूगल मैया की गोद में बैठकर डाटा आधारित खोज के आधार पर कर लेते हैं। फिर इन्हीं इलाजों के चलते अस्पताल पहुँचते हैं तो वहाँ अपना ज्ञान डॉक्टर पर पोतने का प्रयास करते हैं। डॉक्टर के सुझाए तुरंतोफिल का नाम सुनते ही डॉ. रोगी एकदम से चौंक गया। गूगल मैया के कान में डॉक्टर की बताई दवा का नाम डालते ही न जाने ऐसा क्या परिणाम देख लिया कि एकदम से वह उछल पड़ा। उसने कहा, डाक्टर साहब! तुरंतोफिल में ‘निद्रोप्लेक्स’ की मात्रा अधिक होती है। इससे दिमाग पर असर पड़ सकता है। आप कोई और दवा लिख दीजिए।“

डॉक्टर ने तुरंतोफिल के बदले ‘शांतोनियम 100 एमजी’ सुझाया। कहा, इसके एक डोज से तबीयत चंगी हो जाएगी। इस पर डॉ. रोगी ने फिर से बताई दवा के बारे में गूगल को टटोलकर देखा। गूगल ने जाने क्या बता दिया कि डॉ. रोगी नकारते हुए कहा, डॉक्टर साहब उस दवा में ‘फेफडेमियम’ की मात्रा अधिक होती है, जिससे फेफड़े पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए आप यह दवा रहने दीजिए। कोई और दवा सुझाइए। यह सुनते ही डॉक्टर का दिमाग पक गया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, मुझे यह समझ में नहीं आता कि एमबीबीएस की पढ़ाई मैंने की है या आपने। हर दवाई में कुछ न कुछ नुस्ख निकालते रहते हैं। मैं कुछ कहूँ उससे पहले ही फोन निकालकर उसमें ढूँढ़ने लग जाते हैं। जब आपको मोबाइल देखकर ही दवा लेनी है तो मेरे पास क्यों आए? वैसे मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि सुबह करवाई जाँच की रिपोर्ट तो अब आयी है, लेकिन आपको तो देखकर लगता है कि यह सब आप पहले से जानते हैं। आपको कौनसा रोग है यह भला कैसे पता चला?

देखिए डॉक्टर साहब मेरे घर पर सीटी स्कान और एमआरआई छोड़कर सब कुछ है। एक तरह से मान लीजिए कि छोटा सा डायग्नोस्टिक सेंटर है। अब आए दिन डॉक्टर इतने टेस्टिंग लिखते हैं कि उन सबसे ऊबकर मैंने घर पर ही लैब खोल ली। बार-बार टेस्टिंग के खर्चों से बचने का इससे बढ़िया उपाय और क्या हो सकता है!

भगवान न करे कल के दिन आपको कुछ हो जाए और ऑपरेशन की जरूरत पड़ जाए। किसे पता इसके लिए घर पर ही ऑपरेशन थियेरटर भी बनवा लेते और अस्पताल के झंझट से छुटकारा पा जाते। सीधा यूट्यूब देखते और अपना इलाज स्वयं कर लेते। पहले नीम हकीम से जितना डर नहीं था उससे तो ज्यादा डर इस नेट डाटा की खोजी दवाइयों और यूट्यूब से लगने लगा है। आप मुझे क्षमा कीजिए। मैं आपका इलाज नहीं कर सकता। बेहतर यही होगा कि आप अपना इलाज स्वयं कर लें।

इतना कहते हुए डॉक्टर ने अगले रोगी को भीतर बुलाने का आदेश दिया।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657