थे दृग चंचल नेह लिए

थे दृग चंचल नेह लिए

      पलक उठी संकोच लिए,

वो नजरें फिर गिर गिर जाती

       जाने कितनी बात छुपाती,

जिय में कितने भेद लिए 

       थे दृग चंचल नेह लिए।


सम्मुख जैसे प्रेम खड़ा 

      अपनी उत्सुकता पर अड़ा,

संयम मोह को रोक रहा 

       जाने क्या-क्या सोच रहा,

प्रेम के कितने रंग लिए

       थे दृग चंचल नेह लिए ।


सभा सम्मुख सर्वस्व दिखा 

    ऊहा पोह की कैसी है दशा,

कितने शब्द बिखर से जाते 

      जिनको समेटे मन अकुलाते, 

सरस प्रीत की रीत लिए 

       थे दृग चंचल नेह लिए।।


कवयित्री अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया ,उत्तर प्रदेश