प्रलय दिन जाएगी

प्रलय दिन जाएगी

हम जानते हैं कि तुम

अभी तो राज करोगी

लग गई हो मुंह उनके

जीना दुर्लभ  करोगी

भले ही हो जेब  खाली

तुम हो क्यों जाती मांगी

गरीबों को हो तड़पाती

बार-बार तुम रुलाती

अमीरों के काम बनाती

प्रश्नपत्र तुम खुलवाती

कभी नौकरी हो दिलाती

क्यों नहीं तुम चली जाती

कौन जगह है जहां तुम

बोलो नहीं हो पाई जाती

रहम क्यों नहीं करती

गरीबों के आंसू न हरती

कोई तो कोर्ट में है रोता

कोई अस्पताल में रोता

जिनके मुंह हो तुम लगी

क्या अंत संग जाओगी चली

किसी में इतना दम कहां

साथ ले जाए छोड़े जब जहां

मिलती बद्दुआ कहां-कहां

क्यों न सोचते लोग भला

कौन इस जहां में आवेगा

जो रिश्वत को कुचलेगा

या प्रलय दिन है तू जाएगी

पर साथ न किसी के जाएगी

जीना  भी दुशवार किया है

शांति में ही भंग किया है

अब सबको समझना होगा

स्वदेश को बचाना ही होगा

जड़ें इसकी फ़ैल गयीं कितनी

नस में से नस है गयी उपजी

एक जड़ जब कट जाती है

दूसरी जड़ हरिया जाती है

आज गरीब की है लड़ाई

यह रिश्वत है क्यों बनाई

पूनम पाठक बदायूँ