वक्त

वक्त मानो  सांसे  रोके  खड़ा है,

कहता अभी तो पहला कदम है।

अभी  तो  पंखों को  फैलाना  है,

अपनी शक्ति से  तुम्हें  हराना है।

थोड़ी सी मोहलत  तुम्हें  देता हूं ,

कर लो जो जतन चाहे,कहता हूं।

दिन-ब-दिन ढलती उम्र के साथ,

चेहरे  पर हो  झुर्रियों का  वास।

चाहे  गढ़ लो  कितने  ही  खाचें,

न  रोक  पाओगे  यह बहते रेले।

आए गए कितने  राजे  महाराजे ,

दफन हुए वक्त के साथ यह सारे।

गुरूर किसी  का ना टिक  सका,

फितूर  हर एक  का  उतर  गया।

न करना फिर कभी यह गुस्ताखी,

वरना वक़्त से ना मिलेगी  माफी।

इंसान  इंसानियत के साथ जियो,

प्रेम तपस्या समर्पण के घूंट पियो।

डाॅ0शीला चतुर्वेदी,'शील',प्र0अ0/ SRG 

बेसिक शिक्षा परिषद देवरिया-उ0प्र0