"इंसान की मृत्यु के बाद जो क्रियाएं और साथ में मृत्यु भोज करवाया जाता है वो कितना उचित"

इंसान की मृत्यु होते ही आत्मा देह त्याग देती है, देह को जलाया जाता है और हड्डियों को विसर्जित कर दिया जाता है, और कहा जाता है कि आत्मा को उसके कर्म के हिसाब से दूसरा जन्म भी मिल जाता है मतलब एक इंसान का संपूर्ण नाश, इस जन्म के सारे रिश्ते नातों से मुक्त हो जाता है तो उसकी मृत्यु पश्चात  की गई क्रियाएं किसको पहुँचती है? कौन हकदार होता है जिनके लिए लोग कर्ज़ लेकर भी क्रिया और मृत्यु भोज करवाते है। और ना करने पर समाज द्वारा की गई आलोचना के शिकार होते है।

कुप्रथाओं में एक प्रथा मृत्यु भोज समाज का सबसे बड़ा कलंक है, घर का एक सदस्य दुनिया छोड़ कर चला जाता है उसके पीछे मेहमानों को मिठाई खिलाना कौनसा पुण्य का काम है? और कैसे लोग मिठाई का एक कौर भी हलक के नीचे उतार सकते है।

घर में सगाई शादी जन्म दिन या कोई भी खुशी का मौका हो, तो समझ सकते है कि मिठाई बनाकर खिलाएं और खुशी का इजहार करें, लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाइयां परोसी जाएं, खाई जाएं, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें। इस भोज के भी अलग-अलग तरीके हैं। कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता है। कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेरहवें दिन तक चलता है तो कहीं ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं तीन दिन चलता है। कई जगह पर प्रथा होती है कि जिस घर में मृत्यु होती है उस परिवार के लोग अवसाद में होते है तो सहानभूति जताने उनके रिश्तेदार 14 दिनों तक मरने वाले के घर पर ही रहते हैं। पर सोचिए घर में एक ही कमाने वाला होता है वही चला गया हो तब एक तो आर्थिक संकट भी होता है, ऐसे में 15 दिन तक मेहमानों को रखना खिलाना-पिलाना आसान नहीं होता। सिर्फ़ नज़दीकी एक दो लोग ठहर कर उस परिवार का बोझ कम कर सकते है।

और ब्राह्मणों के हाथों क्रिया करवाना आजकल आसान नहीं रहा, कई तरह के सामान और दान-दक्षिणा मिलाकर हज़ारों रुपयें लग जाते है। बात पैसों की भी नहीं पर ये सब क्यूँ और किसके लिए? कौन स्वर्ग जाकर वहाँ क्या होता ये देखकर वापस लौटकर आया है, और किसने बताया है कि ये सब करने से ही आत्मा को मोक्ष मिलता है। 

कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे मृत्युभोज का सामान लाने निकल पड़ते हैं। शास्त्रों में मृत्यु भोज वर्जित है। महाभारत में एक प्रसंग मिलता है जिसमें कृष्ण कहते हैं कि कहीं भोजन करने तब जाएं जब भोजन करवाने वाले और भोजन करने वालों का मन प्रसन्न हो। दु:ख के समय किसी को भोजन करवाना नहीं चाहिये न भोजन करना चाहिए। जब खुद भगवान इस प्रथा का विरोध करते है तो हम इंसान क्यूँ इस प्रथा का विरोध नहीं करते। सदियों से दोहराए जा रहे है।

सनातन धर्म में मृत्यु भोज जैसी कोई परम्परा ही नहीं है । तेरहवें दिन तो चूल्हा जलता है। क्या तेरहवें दिन जब सभी स्वजन शुद्धि हेतु पूजा-हवन आदि करने के उपरान्त प्रसाद लेते और देते हैं, उसे मृत्युभोज कहा जाएगा? यह विधर्मियों व वामपन्थियों का दुष्प्रचार मात्र है।

पशु भी अपने साथी के मर जाने पर उस दिन चारा नहीं खाता है। दूसरी ओर 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव, जवान आदमी की मृत्यु पर हलुवा पूड़ी खाकर शोक मनाने का ढोंग रचता है ये निंदनीय नहीं तो और क्या है। मृत्युभोज समाज में फैली कुरीति है व समाज के लिये अभिशाप है, इसका बहिष्कार करना चाहिए।

स्वामी दयानन्द सरस्वती, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी और स्वामी विवेकानन्द जैसे महान मनीषियों ने मृत्युभोज का जोरदार ढंग से विरोध किया है। पर आज भी इस प्रथा को हम दोहराए जा रहे है। कहीं से तो शुरुआत हो इस प्रथा को बदलने की।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु