किन्नर की व्यथा

ना मेरा आगमन आसमान से हुआ है। 

और ना ही मैं धरती से अंकुरित हुआ।

 

मेरा आगमन वैसे ही हुआ है। जैसे कि

तुम्हारा,इसका,उसका और सभी का ।


मेरे जन्म पर मेरे पिता नें मातम मनाया।

मेरी मां नें कोख से कहा तुने हमें लजाया। 


परिवार नें त्याग दिया,तिरस्कार किया।

ईश्वर नें भी उम्र भर का गम बेहिसाब दिया। 


कहीं शादी ब्याह हो या हो बच्चा।खुशियां

खूब लुटाऊं।इन्हीं खुशियों के लिये खुद 

तरस जाऊं।


लोगों के लिये नाच गाकर तालियां खूब

बजाऊं।पूर्ण स्त्रीत्व या संपूर्ण पुरुषत्व के

लिये नित्य ही तरसते जाऊं ।


ना तो मैं पुरुष बना और ना ही स्त्री बना।

फिर भी सभी के लिये दुआओं की झोली बना।


माता-पिता मैं भी तुम्हारी ही संतान हूं।

लज्जित और शर्मिंदा ना हों।मैं परमात्मा

का वरदान हूं। 


अब तो कोर्ट भी थर्ड जेंडर  (तृतीय लिंग )को

मान्यता देता है। तुम भी मुझे स्विकार करो ।

अब और नहीं किन्नर बच्चे का तिरस्कार करो।


विनय है माता -पिता और समाज से। किन्नर

बच्चा जैसा है उसे वैसा ही स्विकार करें। यही

ईश्वर की मर्जी है। इस मर्जी का सम्मान करें। 


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार ramamedia15@gmail.com