कब थमेगा ये अत्याचार

               सच कहा है किसी ने।

             कभी तो मैं सिर पे बैठाऊं,

              कभी उसे ठोकर लगाऊं,

             कभी उसे मैं मार गिराऊं,

              कभी मैं वारी-वारी जाऊं।

जी हां कभी उसे पूजा जाता है, कभी उसी का ही कत्लेआम  किया जाता है।

कभी उसे प्यार से सीने से लगाया जाता है तो कभी वासना से चिपकाया जाता है।

 कैसा रूप है ये इन्सान का?

एक ही छवि है, एक ही रूप होता है बेटी का लेकिन उसमें इतना फर्क क्यों नज़र आता है इन्सान को।

अपनी बेटी की वो पूजा करता है लेकिन दूसरों की बेटी को वासना भारी निगाह से ताकता है।

क्या वो बेटी नहीं, वो भी तुम्हारी बेटी जैसी है, उसे बेटी क्यों नहीं समझता इन्सान?

कहीं पर गर्भ में बेटी होने पर भ्रुणहत्या होती है, और यदि बेटी ने जन्म ले लिया तो उसे कूड़ा-करकट में या कहीं नदी-नाले में कूड़ा-कचरा समझ कर फेंक दिया जाता है।

क्या वो जीव नहीं?

 कैसे कोई मां माता-पिता अपनी औलाद को, अपने जिगर के टुकड़े को ऐसे फेंक सकता है?

कहां से लाते हैं वो मां-बाप ऐसा पत्थर दिल?

कैसे अपने ही हाथों उस कचरा पात्र में फेंकते हैं जहां अनेकों जानवर आकर कचरा खाते हैं।

 मानो कोई कुत्ता, सुअर या अन्य जानवर अगर उस मासूम को खा ले तो सुनकर ही दिल दहल जाता है, और जो फेंक कर आते हैं उनका दिल इस के लिए कैसे रज़ामंद होता है?

एक मासूम पर दया भी नहीं आती ?

अभी हाल ही में जून 2021 में गाजीपुर में गंगा के किनारे एक नाविक को लकड़ी का एक बाक्स मिला, जब उसने खोला तो उसमें लाल चुनरिया में लिपटी नवजात बच्ची दिखी, जिसे उसने इश्वर का प्रसाद समझ ग्रहण किया।

 बेशक सरकार ने उसका पूरा खर्च उठाने का ऐलान किया है। 

लेकिन क्या आप जानते हैं, मां-बाप गरीब हों या अमीर अपने बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पालते हैं, हर एक को सरकार खर्चा देने नहीं आती, लेकिन जब सरकार की तरफ से उस बच्ची को खर्च मिलेगा तो कभी वो भी सोचेगी कि क्यों सरकार की तरफ मेरा ही खर्च मिल रहा है, मेरे भाई या बहन का नहीं।

और इसका जवाब भी क्या वो ढुंढना नहीं चाहेगी, लेकिन जब जवाब में असलियत उसके सामने आएगी तो क्या बीतेगी उस पर, जब उसे पता चलेगा उसे उसके माता-पिता ने उसे जन्म देते ही कचरा समझ फेंक दिया था।

 कितनी तकलीफ़ होगी उस वक्त उसे? 

कितने खून के आंसू रोएगी वो उस समय? 

ये नहीं समझ सकता कोई।

कभी सोचा है किसी ने कि केवल बेटी ही क्यों इस तरह कचरे में फेंकी या नदी-नाले में बहाई जाती है?

बेटा क्यों नहीं?

इसका कारण है आज के समय में बढ़ता कुकर्म।

कोई भी बेटी आज स्वच्छंद नहीं घूम सकती, चारों तरफ वहशी भेड़ियों की भीड़ है, ना जाने कब कहां से कोई वहशी दरिंदा आए और कब उसे नोच खाएं।

 हर माता-पिता को यही फिक्र रहती है दिन-रात।

छह महीने की बच्ची हो या हो छह साल की या सोलह साल की आज कोई भी सुरक्षित नहीं है।

अजी जनाब आज के समय में तो साठ साल की बुजुर्ग भी सुरक्षित नहीं। 

वासना में अंधे ये वहशी दरिंदे ये भी नहीं देखते कि कोई बुजुर्ग है या बच्ची, उन्हें केवल अपनी वासना पूर्ति चाहिए।

क्यों गिर गया है आज का इंसान इतना?

इसके बाद अगर बेटी सही -सलामत पल -पढ़ जाए तो शादी कि फिक्र कि शादी के लिए मूंहमांगा दहेज दे पाएंगे या नहीं?

अगर मूंहमांगे दहेज का इंतजाम है तो ठीक, वरना बेटी की शादी नहीं होगी। 

हर पिता जैसे भी हो अपनी बेटी की खुशी के लिए भरसक प्रयत्न करता है।

 लेकिन कहीं पर इसके बावजूद भी बहुएं जलाई जाती है। 

कभी सोचा है जिसे आप बहू समझकर , कहकर प्रताड़ित करते हैं या जलाते हैं वो भी बेटी है, आप की ना सही किसी और की सही। 

सोचिए उसके स्थान पर आपकी बेटी इस प्रताड़ना से गुज़रे, कितनी तकलीफ़ होगी आपको, यही सोच दूसरों के लिए भी रखें 

एक और व्यथा बेटी के लिए अगर वो किसी कारण वश मां नहीं बनीं तो उसे प्रताड़ित किया जाता है।

क्या मां ना बनना अवश्यमेव औरत की ही कमी होती है?

क्या पुरुष में कोई कमी नहीं होती ?

तो इसका दोष औरत के ही माथे क्यों मढ़ा जाता है?

और उस पर भी देखिए फिर से वही बात आ जाती है कि अगर भ्रुण में बेटी हैं तो अबार्शन करवाने पर मजबूर किया जाता है, या जन्म देने के बाद उसे इधर-उधर कूड़ा-करकट समझ कर फेंक दिया जाता है।

जब तक दहेज एवं रेप जैसे कुकर्मों के लिए सख्त से सख्त सज़ा नहीं दी जाएगी,  आए दिन ऐसी खबरें सुर्खियां बनती रहेंगी।

केवल कानून बनाना ही प्रयाप्त नहीं उसका अनुसरण शीघ्रता से होना चाहिए, आम जनता को भी जागरुक होना होगा।  कहीं अगर ऐसा अन्याय होते देखें तो किसी कानून या कानून के रखवाले का इंतजार ना कर उसे वहीं सजा दी जाए, तभी थमेगा ये बेटियों पर अत्याचार।

प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)