बादल

बादल मानों गरज गरजकर,

अपनी व्यथा सुनाते हैं।

सूरज से तपती धरती पर

अपना स्नेह लुटाते हैं।

चले मिलन ज्यों चिर संगिनि को,

भरकर भावों की गागर,

प्रथम वृष्टि की मृदु सुगन्ध से

मनहुँ चले मदमाते हैं।

व्यग्र धरा भी शीतलता हित

बाट जोहती है नभ की,

वर्षा की डोरी में बिंधकर 

मेघ धरा पर आते हैं।

सघन प्रतीक्षा के दिन बीते,

बीत गयीं बोझिल रातें,

मुस्कानों का सागर लेकर

मेघ चले मदमाते हैं।

अवनि-व्यथा भी दूर हो गयी,

देखा जब घिरते बादल

धरा-गगन ये युगल देख

एक दूजे को मुस्काते हैं।


 ©डॉ0श्वेता सिंह गौर, हरदोई