मेघदूत

मेघ तुम्हें दे दूत की उपमा

हम पछताते है,

प्रिय के निकट मेरे संदेशे

पहुँच न पाते है।

अंखियाँ रही निहार गगन,

तुम खेलों आँख मिचौली,

पवन को भी संग ले आते हो,

किरणों से भरते झोली,

क्रोध की ज्वाला हृदय जलाये

मन भर आते है,

मेघ तुम्हें दे दूत की उपमा

हम पछताते है।

भानु को मीत बना के अपना,

धरा को जल का दिखा के सपना,

सलिल सरोवर और मधुशाला,

सब रस पी गये बची न हाला,

धरा प्यास से व्याकुल हम सब

आस सजाते है,

मेघ तुम्हें दे दूत की उपमा

हम पछताते है।

चातक पीऊ पीऊ न बोले,

कोयल अपना मुख न खोले,

पंख मयूर खोल न पाता,

मोह तुम्हारा छोड़ न पाता,

हर मन पुलकित कब आओगे

सपन लजाते है।

मेघ तुम्हें दे दूत की उपमा

हम पछताते है।


सीमा मिश्रा,बिन्दकी-फतेहपुर,

उत्तर प्रदेश