मन में मीत

मन में प्रीत जगा कर देखो

अस्फुट कमल छिपा होगा ही

नेह सुधा बरसा कर देखो

उर में गीत लिखा होगा ही

मन में मीत बसा होगा ही


किंचित दर्द भले हो दिल में

कहीं हर्ष भी तो होगा ही

अंतर्मन महका कर देखो

एक संगीत छिपा होगा ही

मन में मीत बसा होगा ही


कुंठित कली, पुष्प मुरझाए

उपवन  में अवसाद भले हो

कहीं किसी झुरमुट के पीछे

मधुप  छिपा बैठा होगा ही

मन  में मीत बसा होगा ही


रात्रि का अंधकार घना हो

अंबर  में घनघोर  घटा हो

कहीं किसी बदली के पीछे

चाँद छिपा बैठा होगा ही

मन में मीत बसा होगा ही


सागर में  तूफ़ान  उठा हो

लहरों का उत्पात मचा हो

जलधि के गहरे अंतर में

मुक्ता सीप छिपा होगा ही

मन में मीत बसा होगा ही


सुभाषिणी विश्नोई

पंचकुला

हरियाणा