दुआ

तपीश थी इतनी, 

बरसात होने लगी, 

फूल थे मुरझाए, 

अब कलियाँ खिलने लगीं, 

लग रहा अब किसी की, 

दुआ काम करने लगी।


दर्द का बाढ़ था, 

आंसू थमते न थे, 

जख्म वो रीसता था, 

घाव अब भरने लगे, 

नमी थी आंखों में, 

अब वो हंसने लगी, 

लग रहा मां की दुआ, 

अब काम करने लगी।


वो रूठा था मुझसे, 

अब तक यहां, 

अब वो भी मुझे, 

समझने लगा, 

प्यार था सच्चा, 

काम करने लगा, 

दूरियां अब यहां मिटने लगी, 

लग रहा प्यार की दुआ, 

अब काम करने लगी।


है दुआ में जो ताकत, 

है ताकत और कहां, 

जहां दवा काम ना करें, 

काम करती है दुआ।


स्वरचित- अनामिका मिश्रा , (लेखिका, कवयित्री) 

झारखंड, सरायकेला (जमशेदपुर)