नशा

न--नशा है नशा किसी को 

दौलत का नशा,किसी

को शराबों- शबाब का नशा ,

नशे में चूर है सारा जहाँ,

कौन नहीं है ,नशे में यहां

किसी को भक्ति का नशा

किसी को शक्ति का नशा,

कोई मयखाने में झूम रहा हो

नशे में चूर यहाँ,

किसी को कुर्सी का नशा,

किसी को ओहदे का नशा,

नशे की कैफियत 

न पूछों यारों

दौलत के नशे में चूर कोई 

शीश महल बनवा रहा,

तो इश्क के नशे में 

चूर शाहजहांँ

ताजमहल बनवा गया,

पूछो जिन्हें था 

देशभक्ति का नशा,

सरेआम जो चूम

फांसी के तख्त को

एक इबारत लिख गए,

माथे से लगा कर तिलक 

देश के रज की

इबादत कर.गए,

नशे में जो डूबी सरोवर 

तो अश्कों की

कहानी लिख रही।

शा -शानोशौकत,दौलत -

शौहरत पद-प्रतिष्ठा

मायावी रूप का ही क्यों न हो

नशा-ए-मंजिल सबकी

एक है शमशान -ए-राख 

            

सुनीता सिंह सरोवर,वरिष्ठ कवयित्री व 

शिक्षिका,उमानगर-देवरिया,उत्तर प्रदेश