विधि ने शायद

विधि ने शायद चाहा मुझसे,

गिरकर भी स्वयं संभल जाऊँ!

कोई देख सके नहिं डगमग पग,

खुद का खुद सम्बल बन जाऊँ!

मैं व्यर्थ शिकायत कर बैठी,

क्यों साथ नहीं कोई आया!

जब कदम थके तन्हाई थी,

नहीं साथ दिखा अपना साया!

निज पीड़ा को रख तह करके,

औरों के गम मैं अपनाऊँ!

विधि ने शायद चाहा मुझसे,

गिरकर भी स्वयं संभल जाऊँ!

अपनत्व के छद्मावरणों में,

नाहक ही उलझूँ जग भूलूँ!

ना ऐसी कोई चाह रही,

मैं धरा त्यागकर नभ छू लूँ!

हो जाएं बेकल अवनि-गगन,

मैं ऐसी सरगम क्यों गाऊँ!

विधि ने शायद चाहा मुझसे,

गिरकर भी स्वयं संभल जाऊँ...


©डॉ0श्वेता सिंह गौर

हरदोई, उत्तर प्रदेश